31 साधुओं सहित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने शीतकालीन प्रवास में काफी धर्म प्रभावना कर आर्यिका श्री पूर्णिमा मति की जन्म धर्मनगरी निवाई से 2 फरवरी की दोपहर को जयपुर के पास दिगंबर अतिशय क्षेत्र पदमपुरा के लिए विहार किया। निवाई से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
निवाई। अभी ना जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं, बहता पानी रमता योगी रोके ना रुके। यह उस समय कहावत चरितार्थ हुई, जब 31 साधुओं सहित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने शीतकालीन प्रवास में काफी धर्म प्रभावना कर आर्यिका श्री पूर्णिमा मति की जन्म धर्मनगरी निवाई से 2 फरवरी की दोपहर को जयपुर के पास दिगंबर अतिशय क्षेत्र पदमपुरा के लिए विहार किया। उनके साथ मुनिश्रीहितेंद्रसागरजी मुनिश्री प्रभवसागरजी ,मुनिश्री चिंतनसागर जी, मुनिश्री दर्शितसागरजी, मुनिश्री प्रबुद्ध सागरजी, मुमुक्षुश्री सागरजी, मुनिश्री प्रणीतसागरजी, मुनिश्री ध्येयसागरजी, मुनिश्री भुवन सागरजी, आर्यिका शुभमति, चैत्यमती, विलोकमति, दिव्यांशुमति ,पूर्णिमामति, मुदितमति, विचक्षणमति, समर्पितमति, निर्मुक्तमति, विनम्रमति, दर्शनामति, देशनामति, महायशमति, देवर्धिमति, प्रणतमति, निर्माेहमति, पद्मयशमति, दिव्ययशमति, प्रेक्षामति जिनेशमति, ऐलकश्री हर्षसागरजी ,क्षुल्लकश्री प्राप्तिसागरजी ने विहार किया।
पुरुषार्थ कर मानव जीवन को सफल बनाएं
आचार्य श्री ने विहार के पूर्व उपदेश में बताया कि जिस प्रकार लौकिक धन संपत्ति को आप सुरक्षित लाकर, तिजोरी में रखते हैं, इस प्रकार देव शास्त्र गुरु के सानिध्य में प्राप्त धर्म से पुण्य की प्राप्ति होती है। इसे हृदय रूपी तिजोरी में सुरक्षित रखें। इसकी रक्षा कुगुरु, कुदेव कुशास्त्र मिथ्यात्व से रक्षाकर रत्नत्रय सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र प्राप्त करने का पुरुषार्थ कर मानव जीवन को सफल बनाएं। संघ की आपने अभी तक प्रवास में भक्ति पूर्वक विनय की है। ऐसी श्रद्धा और विनय देव शास्त्र गुरु के प्रति बनाकर रखें। देश में चार करोड़ से अधिक जैनों की जनसंख्या 40 लाख तक हो गई है। धर्म के प्रति समाज की उदासीनता ठीक नहीं है।
घर- घर आचार्य श्री की आरती कर चरण प्रक्षालन किए
आचार्य श्री ने प्रवचन में आगे बताया कि हम शुद्ध जल ग्रहण करने का नियम इसलिए देते हैं कि आपका जीवन भी उन्नत शील और शुद्ध बने। भविष्य में आप अणुव्रती महाव्रती बने ताकि निकट भविष्य में तीर्थंकर कुल में जन्म लेकर तीर्थंकर बन सकें। इसलिए कुल की शुद्धि हमेशा बना कर रखना चाहिए। विहार के दौरान समाज के घर- घर आचार्य श्री की आरती कर चरण प्रक्षालन किए गए। समाज के सभी उम्र के भक्तों के नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। जिनोदय युवा संघ जिनकी दिनचर्या श्री जी आचार्य संघ के दर्शन अभिषेक पूजन जाप, स्वाध्याय से प्रारंभ होती थी। अनेकों भावविहल थे। आचार्य श्री संघ सानिध्य में प्रातः श्री जी का भव्य विभिन्न रसों से पंचामृत अभिषेक ओर शांति धारा ज़िनोदय युवा संघ द्वारा की गई। सकल जैन समाज द्वारा आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का भव्य पूजन हुआ। मंत्रोच्चार आर्यिका श्री महायश मति ने किए।
परमीत, पवन बोहरा, मोहित, हेमंत ने बताया कि सोमवार को 5 किमी विहार कर रात्रि विश्राम प्रथमाचार्य श्री शांति सागर भवन श्री सुशील नीरा पाइप फैक्टरी परिसर चैनपुरा रेलवे फाटक के पास हुआ। 3 फरवरी को प्रातः विहार 3.9 किमीहोकर संघ की आहार चर्या संदीपन स्कूल मुंडिया ग्राम में होगी। आचार्य संघ को पुनः पदमपुरा संघ सहित पधारने का निवेदन करने अतिशय क्षेत्र पदमपुरा दिगंबर जैन मंदिर पंच कल्याणक कमेटी के संयुक्त प्रतिनिधि राजकुमार कोठारी, सुरेश सबलावत, सुधीर दौसा, महेंद्र अनूप अनोपडा, योगेश, टोडरका, राम पाटनी, मोहित, शैल बाला, ईश्वरलाल, महावीर पाटनी, राकेश सेठी सहित अनेक पदाधिकारी पधारे।
परंपरा का इतिहास
आचार्य संघ का आचार्य श्री वीरसागर जी, श्री शिव सागर जी, श्री धर्म सागर जी से सन 1955 के पूर्व से आत्मीय भावनात्मक संबंध रहा। सन 1955 में रत्नत्रय के प्रतीक तीनों भावी आचार्यों का पदार्पण हुआ था तब 41 फिट के मान स्तंभ की प्रतिष्ठा संपन्न हुईं थी। उसके बाद आचार्यकल्प श्री श्रुतसागर जी, श्रीअजितसागर जी, श्री वर्धमान सागर जी, आर्यिका श्री आदिमति आदि अनेकों बार पधारे चातुर्मास भी किया। आचार्य श्री के संघ मंगल सानिध्य में 18 से 22 फरवरी तक नूतन चौबीसी सहित अन्य जिन बिंब प्रतिमाओं का भव्य पंच कल्याणक अतिशय क्षेत्र पदमपुरा में होगा। इसक पूर्व भी पदमपुरा आचार्य श्री वर्धमान सागर जी अनेक बार गए हैं।













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