नगर में शुक्रवार की प्रातः बेला में धर्म सभा में सर्वप्रथम मंगलाचरण शोभना सांवला ने किया। मंगल प्रवचन देते हुए आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने कहा कि संसारी जीव के पास दो ही चीज हैं। सत्य या असत्य जैसा व्यक्ति का मन मस्तिष्क होगा, वैसा ही कार्य होगा बुराई का होगा तो बुराई का काम होगा। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की खबर…
रामगंजमंडी। नगर में शुक्रवार की प्रातः बेला में धर्म सभा में सर्वप्रथम मंगलाचरण शोभना सांवला ने किया। मंगल प्रवचन देते हुए आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने कहा कि संसारी जीव के पास दो ही चीज हैं। सत्य या असत्य जैसा व्यक्ति का मन मस्तिष्क होगा, वैसा ही कार्य होगा बुराई का होगा तो बुराई का काम होगा। अच्छाई में आत्मसात होगा तो व्यक्ति अच्छा करेगा। यही कारण है कि कहा जाता है कि अच्छा विचार करो। हमें अच्छा होने की अभिव्यक्ति नहीं हो पाती, हमें परिवर्तन करना होगा। धर्म ध्यान करने से ही आत्म कल्याण के मार्ग खुलते हैं। आप मोहल्ले में घूमते हो तो नजर आता है कि लोग दुख परेशानियां से रचित है। लोग मानसिक शारीरिक कष्टों में रह रहे हैं। यही देखने को मिलता है कि संपूर्ण जीव दुखी दिखाई पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि आप अपने कार्यों से संतुष्ट नहीं है। इसीलिए दुख है। संतोष से बड़ा कोई धन नहीं है धन का अभाव इतना परेशान नहीं करता जितना संतुष्ट नहीं होना होता है लेकिन, हमें संतुष्टि नहीं है। लोगों को संतुष्ट होना नहीं आता। सुख का सबसे बड़ा कारण संतोष है जो मिल गया है उसी में संतुष्ट होना सुख है। पड़ोसी के सुख को देखकर अपने आप को देखते हैं और संतुष्ट नहीं होते।
जो कुछ भी करते हैं उसकी कीमत जब होती है जब वह शुद्ध होता है उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सोने की कीमत खदान में नहीं होती सोने की कीमत बाहर निकलने के बात होती है शुद्ध होने के बाद ही उसकी कीमत होती है। हमारी कीमत नहीं है हमने क्या किया उसकी कीमत है। आचार्य श्री ने ज्ञान के विषय में कहा कि ज्ञान स्व पर प्रकाशक होता है। ज्ञान में क्षमता है कि वह दुख का निराकरण करता है। अज्ञान दुख देने वाला होता है और ज्ञान सुख देने वाला होता है।













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