तपोभूमि प्रणेता आचार्यश्री प्रज्ञा सागर महाराज ने मंगलवार प्रातः बेला में तपोभूमि में स्वयं अपने हाथों से केशो का लोचन किया। इस अवसर पर आचार्य श्री का उपवास रहा। यह बिना कुछ खाए पिए भूख और प्यास को सहन करते हुए उपवास पर रहें, जो अपने आप में एक उत्कृष्ट तप साधना साधना है। उज्जैन से पढ़िए अभिषेक जैन की यह खबर…
उज्जैन। तपोभूमि प्रणेता आचार्यश्री प्रज्ञा सागर महाराज ने मंगलवार प्रातः बेला में तपोभूमि में स्वयं अपने हाथों से केशो का लोचन किया। इस अवसर पर आचार्य श्री का उपवास रहा। स्वयं के हाथों बिना किसी अस्त्र के अपने हाथों से घास फूस की तरह संत केशों को निकालते हैं, जो अपने आप में एक उत्कृष्ट साधना होती है। ऐसी भीषण गर्मी में हम प्यासे से नहीं रह पाते हैं। थोड़ी सी गर्मी में हम व्याकुल हो उठते हैं। ऐसे में गुरुदेव बिना कुछ खाए पिए भूख और प्यास को सहन करते हुए उपवास पर रहें, जो अपने आप में एक उत्कृष्ट तप साधना साधना है। उनके साथ मुनि श्री प्रिय तीर्थ महाराज आदि रहे।
पंचम युग में एक उत्कृष्ट साधना
केशलोच के बारे में जाने तो यह करना कोई साधारण बात नहीं है, यह जैन संतों का सबसे कठोर तप माना गया है। आम आदमी के जीवन में यदि एक बार गलती से बाल उखड़ जाए तो वह दर्द के मारे कांपने लगता है लेकिन, जैन संत तो बिना किसी औजार के सीधे अपने हाथों से बालों को खींचकर निकाल देते हैं। जैन संत सदा स्वावलंबी होते हैं। वे किसी को भी कष्ट न देते हुए स्वयं की साधना करते हैं। चाहे कैसा भी कष्ट क्यों ना हो। वे समभाव में उसे सहन करते हुए मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होते हैं। जैन संत अहिंसा व्रत के पालन के साथ ही शरीर से राग भाव को भी हटाते हैं। साधु शरीर की सुंदरता को नष्ट करने के लिए अहिंसा धर्म का पालन करते हुए केशलोच करते हैं। जब जैन संत स्वयं के हाथों केशलोच करते हैं तो उनके चेहरे पर मुस्कुराहट देखने को मिलती हैं। जो अपने आप में पंचम युग में एक उत्कृष्ट साधना है।













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