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यादों में आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी : आचार्य श्री ने कहा था कि तुम बहुत अच्छा कर रहे हो


अनिल कुमार जैन, अध्यक्ष पारस पद यात्रा संघ धनबाद, सचिव जैन समाज झरिया, अध्यक्ष पारसनाथ शिक्षायतन समिति ने अपने पिताजी और स्वयं के साथ आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के संस्मरण श्रीफल जैन न्यूज के साथ बांटे हैं…


हजारीबाग। जनवरी 1983 में गुरुवर हजारीबाग आए थे। उन्होंने अपने प्रवचन में कहा था: जो पत्थर छैनी हथोड़ी की चोट से डरेगा, वो पत्थर कभी मूर्ति नहीं बन सकता है। ये बात सुनकर मैं गुरुदेव के साथ पैदल हजारीबाग से दारू नामक जगह जो 12 किलोमीटर दूर है चला गया। ये बात मेरे पिताजी ने मुझे अपने कॉपी में लिखवाई। पिताजी नहीं रहे, गुरुवर विद्यासागर जी भी नहीं रहे। पर उनकी कही बात आज भी मुझे प्रेरणा देती है। 1983 मे कई बार आचार्य श्री विद्यासागर जी से पिताजी के सानिध्य में इसरी बाजार स्थित उदासीन आश्रम गया। उन्होंने बताया था कि भारत में कितने जैन धर्म वाले लोग हैं, यह मायने नहीं रखता। मायने यह रखता है कि कितने लोग जैन धर्म के सिद्धांत, आदर्श को मानते हैं। जियो और जीने दो, अहिंसा परमो धर्म: का पालन करते हैं। 1983 में मैं दस साल का था। तब इच्छा हुई कि आचार्य श्री विद्यासागर जी के साथ हो जाऊं। तब पिताजी ने समझाया कि साथ जाने की तुम्हारी उम्र और परिपक्वता अभी नहीं है। फिलहाल तुम इस क्षेत्र में उनके बताए ज्ञान, सिद्धांत को जन जन तक पहुंचाने में मदद करो आचार्य श्री विद्यासागर जी के पदचिह्नों पर और पारसनाथ धाम के आस पास लोगों को जागरूक करने, जैन धर्म की अच्छाई समझाने में।

मैं अपने शहर झरिया से स्वर्णभद्र कूट तक पदयात्रा निकालने लगा। यात्रा का मकसद था रास्ते में जो लोग, बच्चे, विद्यालय मिलते, उन्हें जैन धर्म के बारे में बताना। समाज कल्याण के लिए कार्य करना। स्वास्थ्य शिविर, दवा वितरण करना इत्यादि। तभी बिहार झारखण्ड का बटवारा हो गया। झारखण्ड में जो मुख्यमंत्री बने वो जैन आदीवासी समुदाय के बीच खाई बढ़ाना चाहते थे। उसे रोकने के लिए मैंने पारसनाथ के आस पास के क्षेत्र में स्वास्थ्य जांच शिविर लगाया, निशुल्क दवा वितरण किया। सभी विद्यालय मे बच्चों में प्रतियोगिता आयोजित की,, पुरस्कार दिए। नतीजा ये हुआ कि बच्चे हम लोगों के आने का इंतजार करते थे। जिस दिन हमारी टीम वहां जाती थी। सभी बच्चे एकदम साफ सुथरे, नहा धोकर आते थे। विद्यालय के शिक्षक भी हमारे इस प्रयास से बहुत खुश थे। हम लोग विद्यालय में जाकर बताते थे कि पारस नाथ तीर्थ स्थल पवित्र स्थल है। ये सिद्ध भूमि हैं। यहां सभी के भगवान का वास है। ये हम सब का है। एक उदाहरण से समझें। अगर आपके आस पास कोई खाली जमीन उपलब्ध है तो आप चाहेंगे कि उस पर मेरा कब्जा हो जाए। लेकिन अगर आपको पता है कि ये जमीन किसी और की है। तो आपका लालच खत्म हो जाएगा। उसी तरह हम लोगों ने बच्चों और शिक्षक को बताया कि पारसनाथ पर्वत जैनियों का पवित्र तीर्थ स्थल है। यहां से 20 तीर्थंकर मोक्ष प्राप्त कीए हैं। उसमें आदीवासी समुदाय का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसका बहुत ही सकारात्मक असर पड़ा। मैंने अपनी इस मुहिम, कार्यक्रम की पूरी जानकारी आचार्य श्री विद्यासागर जी को दी। तो वो बहुत प्रसन्न हुए। आशीर्वाद दिया और कहा एकदम सही जा रहे हो। जैन समाज को तुम जैसे कर्मठ, सचेत, मिलनसार सदस्यों की जरूरत है। जो सबको जोड़ सके।

उनके देवलोक गमन पर उनकी बातें, शिक्षा, आशीर्वाद आंखों के सामने घूम रहा है।

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Shreephal Jain News

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