आचार्य श्री धर्म सागर का 36 वां समाधि दिवस आचार्य संघ के सानिध्य में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस दौरान आचार्य श्री के गुणों से भी समाजजनों को अवगत कराया। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…
उदयपुर। आचार्य श्री धर्म सागर का 36 वां समाधि दिवस आचार्य संघ के सानिध्य में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस दौरान बताया गया कि आचार्य श्री धर्म सागर ने भक्ति आराधना को हृदय में विराजमान कर लिया था। 12 वर्ष की सल्लेखना साधना को महज 4 महीने में क्रमशः पूर्ण किया। सन 1969 में दीक्षित शिष्य आचार्य श्री वर्धमान सागर ने आचार्य धर्म सागर विधान में अज्ञात सल्लेख्ना साधना अध्य का उच्चारण करते हुए देशना दी।

आचार्य श्री के गुणों से अवगत कराया
आचार्य श्री धर्म सागर का गुणानुवाद करते हुए आचार्य श्री वर्धमान सागर ने बताया कि आचार्य श्री धर्म सागर सीकर में एक माह से अधिक नहीं रुके। एक माह पूर्ण होने के पूर्व निकटवर्ती नगर के बाहर चले जाते थे वहीं रात्रि विश्राम कर अगले दिन का आहार वही लेकर पुनः सीकर में आते थे । इस प्रकार स्वास्थ्य कमजोर होने के बावजूद अपने नियमों के प्रति सजग रहे। आज आचार्य धर्म सागर विधान का आयोजन आचार्य श्री संघ सानिध्य में किया गया जिसमें उपवास के बावजूद आचार्य वर्धमान सागर जी ने सभी मंत्रों अध्य का उच्चारण किया और बीच-बीच में आचार्य श्री के गुणों को स्मरण कर समाज को अवगत कराया। आचार्य श्री ने बताया कि आचार्य श्री धर्म सागर दीक्षा के पूर्व गृहस्थ अवस्था में भी निस्पृह रहते थे। इंदौर में कपड़े की गठरी रख कर व्यापार किया मात्र केवल एक रुपए का मुनाफा होने पर व्यापार बंद कर वापस आ जाते थे। संघ के अन्य साधुओं ने भी अपनी भावांजलि प्रगट की।

चातुर्मास के लिए श्रीफल भेंट करने को आतुर दिखे समाजजन
विधान का वाचन मुनि श्री हितेंद्र सागर ने किया। आज के विधान में केशव नगर,आयड, प्रेम नगर, न्यू केशव नगर विभिन्न सेक्टरों की समाज ने पूजन में भाग लिया। जब से आचार्य श्री का उदयपुर आगमन हुआ है। प्रतिदिन अनेक नगरों के समाज चातुर्मास के लिए श्रीफल भेंट कर निवेदन कर रहे हैं। शुक्रवार को केशरिया जी के सैकड़ों श्रावक श्राविकाओं ने पंच कल्याणक व चातुर्मास के लिए श्रीफल भेंट किया। आज सुबह आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने केश लोचन किया।

निर्मोहता के साथ बीता आचार्य श्री का प्राथमिक जीवन
गंभीरा राजस्थान में पौष शुक्ला पूर्णिमा 12 जनवरी सन 1914 में 1008 श्री धर्म नाथ भगवान के केवल ज्ञान कल्याणक दिवस पर उमराव देवी व बख्तावर मल के पुत्र चिरंजीलाल जी का प्राथमिक जीवन संघर्ष तथा निर्मोहता के साथ बिता। 30 वर्ष की उम्र मेंचैत्र कृष्णा 7 संवत 2000 को क्षुल्लक दीक्षा तथा तथा फुलेरा पंच कल्याणक में विक्रम संवत 2008 को ऐलक दीक्षा ली। 38 वर्ष की उम्र में कार्तिक शुक्ला 14 विक्रम संवत 2008 को उन्होंने आचार्य श्री वीर सागर जी से फुलेरा चातुर्मास में मुनि दीक्षा ली। संयोग देखिए कि श्री धर्म नाथ भगवान के कल्याणक दिवस पर जन्मे चिरंजीलाल जी का मुनि दीक्षा बाद नाम भी मुनि श्री धर्म सागर किया गया।
सन 1969 में आप द्वितीय पट्टाधीश आचार्य श्री शिव सागर जी की समाधि के बाद 24 फरवरी 1969 को तृतीय पट्टाधीश बनाए गए। आचार्य बनने पर उसी दिन 11 भव्य जीवों को दीक्षा दी। साधु जीवन के 43 वर्षो में आपने 76 दीक्षा दी जिसमें पंचम पट्टाधीश आचार्यश्री वर्धमान सागर जी आर्यिका श्री शुभ मति माताजी सहित वर्तमान में 7 शिष्य एवं शिष्या धर्म प्रभावना कर रहे हैं। वर्ष 2023 में यह उनका 36वां समाधि वर्ष है। वैशाख कृष्ण नवमी 22 अप्रैल सन 1987 में उनकी समाधि 1008 श्री मुनिसुब्रत नाथ भगवान के केवल ज्ञान कल्याणक के दिन सीकर में हुई।













Add Comment