टोंक में आयोजित दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा कि आचार्य श्री शांति सागर जी परम तपस्वी और आध्यात्मिक उद्योगपति थे। उनके जीवन में धर्म, तप और संयम की गाथाएं युगों तक प्रेरणा देती रहेंगी। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
टोंक में आचार्य संघ सान्निध्य में दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। प्रातःकालीन सत्र में वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मंगल देशना देते हुए कहा कि प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांति सागर जी परम तपस्वी और आध्यात्मिक उद्योगपति थे। उन्होंने 35 वर्षों के साधु जीवन में 9938 उपवास किए और मंदिर संस्कृति की रक्षा हेतु 1105 दिनों तक अन्न का त्याग किया। आपके जीवन में कथनी और करनी का अद्भुत सामंजस्य था। आप समयसार के जीवंत स्वरूप थे और सदैव आगम परंपरा पालन की प्रेरणा देते रहे।
संगोष्ठी का शुभारंभ भगवान आदिनाथ, आचार्य श्री शांति सागर जी और पूर्वाचार्यों के चित्रों के समक्ष दीप प्रवज्जलन, चरण प्रक्षालन एवं जिनवाणी भेंट से हुआ। कार्यक्रम संयोजक डॉ. सुनील संचय और राजेश पंचोलिया ने बताया कि इस अवसर पर डॉ. अनेकांत देहली, डॉ. फूलचंद प्रेमी (वाराणसी), पंडित श्रेयांश कुमार (बड़ौत) सहित अनेक विद्वानों ने चयनित विषयों पर आचार्य श्री शांति सागर जी के त्याग और तप की गाथाओं का गुणानुवाद किया। मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने प्रवचन में बताया कि आचार्य श्री ने श्रमण परंपरा को पुनर्जीवित किया, नग्न साधुओं के विहार पर लगे प्रतिबंध को हटवाया, बाल विवाह पर रोक के लिए कानून बनवाया और मंदिर संस्कृति व जिनवाणी की सुरक्षा हेतु अद्वितीय कार्य किए। संगोष्ठी के दोपहर सत्र में भी विद्वानों ने आचार्य श्री शांति सागर जी के महान तप, त्याग और धर्म साधना का गुणानुवाद प्रस्तुत किया।













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