आचार्य श्री विशुद्धसागरजी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी, मुनि श्री जयंत सागर जी, मुनि श्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्रुतसागरजी नगर के भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजित हैं। यहीं पर मुनिराजों के प्रवचन चल रहे हैं। इसका धर्मलाभ धर्मानुरागी समाजजन ले रहे हैं। यहां पर बड़ी संख्या में समाजजन मुनिराजों के दर्शन और प्रवचन का सार सुनने के लिए आ रहे हैं। नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर…
नांद्रे(महाराष्ट्र)। आचार्य श्री विशुद्धसागरजी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी, मुनि श्री जयंत सागर जी, मुनि श्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्रुतसागरजी नगर के भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजित हैं। यहीं पर मुनिराजों के प्रवचन चल रहे हैं। इसका धर्मलाभ धर्मानुरागी समाजजन ले रहे हैं। यहां पर बड़ी संख्या में समाजजन मुनिराजों के दर्शन और प्रवचन का सार सुनने के लिए आ रहे हैं।
यहां पर मुनि श्री सारस्वत सागर जी ने शनिवार को प्रवचन में कहा कि जीवन में वही व्यक्ति एक धारा में जी सकता है, जो सरलता का व्यवहार करेगा। सरलता में शत्रुता नहीं बनती, सरलता में किसी को आपसे हीनता नहीं आती, सरलता में आपको अपमान और सम्मान की भावना नहीं रहेगी। उन्होंने कहा कि सरलता में अहंकार और हीनता की दुर्गंध नहीं आती है। सरलता में सभी अपने को स्वीकार करते हैं और आप भी सभी को स्वीकार करते हो। मुनिश्री ने कहा कि सरलता वह अस्त्र है, वह शस्त्र है, जिसके बल पर लोगों के ह्रदय में बैठे कषायादिक शत्रुओं का उपशमन हो सकता है और उनके अंतरंग में प्रेम-वात्सल्य का राज्य स्थापित हो सकता है। सरल व्यक्ति जल की तरलता के समान है।
वह जब भी आगे बढ़ता है तो समीकरण करते हुए आगे बढे़गा। सरलता में ही संबंध सुरक्षित रहते हैं। सरलता में हम एक-दूसरे की भावना को समझ सकते हैं और जब एक-दूसरे की भावना समझ में आती हैं। तब हमारे अंदर एकता की दृष्टि जाग्रत होती है। सरल व्यक्ति को सब अपना मानकर उसका सहयोग करते हैं। वर्तमान काल में हम देखें तो चलता-फिरते भगवान के रूप में पूजता है सरल स्वभावी। सरलता को स्वीकारो, सबको अपना बनाओ और सबके बन जाओ।













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