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आज के समय में ज्ञान की नहीं,मुस्कान की कमी - आचार्य विहर्ष सागर जी: दमोह में आचार्य श्री के मंगल प्रवचन से माहौल हुआ धर्ममय


दमोह में बिराजे आचार्य श्री विहर्ष सागर जी महाराज के प्रवचनों से दमोह के कण-कण में मानों जिन-वाणी बस गई है। आचार्य श्री विहर्ष सागर के मंगल प्रवचन और आगे के कार्यक्रमों पर पढ़िए हमारे सहयोगी डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’ की रिपोर्ट


आचार्य श्री ने कहा कि – “आज के समय में ज्ञान की नहीं वरन जीवन में मुस्कान की कमी है । मनुष्य का जीवन बहुत कीमती है इसे रोते हुए नहीं बल्कि मुस्कुराते हुए गुजारना चाहिए क्योंकि कल का दिन किसने देखा है आज के दिन रोए क्यों और जिन घड़ियों में हम हंस सकते हैं उनमें हम रोए क्यों..?” अपने सुवचनों की गंगा बहाते हुए यह विचार दिगंबर जैन धर्मशाला में बिराजे आचार्य श्री ने अपने मंगल प्रवचनों के दौरान व्यक्त किए। इस मौके पर कुंडलपुर क्षेत्र कमेटी के पूर्व अध्यक्ष संतोष सिंघई पूर्व प्रचार मंत्री सुनील वेजीटेरियन नन्हे मंदिर कमेटी के अध्यक्ष गिरीश अहिंसा पवन जैन चक्रेश राजेंद्र अटल महेंद्र करुणा आदि उपस्थिति रही। मनुष्य जीवन बहुमूल्य, इसे उदासियों में नहीं खोना चाहिए।

आचार्य श्री ने आगे कहा कि कि मनुष्य जीवन बहुत बहुमूल्य है । इससे उदासियों में नहीं खोना चाहिए।जीवन की सार्थकता सदैव प्रसन्न निश्चित रहने में है।धर्म हमें हर परिस्थितियों में सहज रहना सिखाता है।परिस्थितियों से सामना करना सिखाता है भागना नहीं। धर्म, हमें निडर बनाता है, डरपोक नहीं।

जो धर्म से दूर होते हैं, वे मृत्यु से भय खाते हैं – आचार्य श्री विहर्ष सागर जी

आचार्य श्री ने आगे कहा कि – जो लोग धर्म से दूर होते हैं वे मृत्यु से भय खाते हैं जबकि एक ना एक दिन हर व्यक्ति को मरना निश्चित है। धर्म सभा के अंत में आचार्य विभव सागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि दमोह नगर वासी अत्याधिक सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें कुंडलपुर महोत्सव के बाद पथरिया में विरागोदय महोत्सव मैं आए अनेक साधुगणों के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।जीवन में गुरु का सानिध्य मिलना बहुत सौभाग्य का विषय होता है। भगवान बनने के गुण मनुष्य में भी मौजूद हैं। सर्वज्ञ प्रभु की वाणी में सबका हित निहित है। आप प्रतिदिन मंदिर आते हैं आपका मंदिर आने का क्या कारण है ? मंदिर आने का हमारा एक ही प्रयोजन होना चाहिए कि मुझे भी भगवान बनना है । मंदिर में भगवान के दर्शन करते हुए हमें यह विचार करना चाहिए कि भगवान भी पूर्व अवस्था में मेरे ही समान थे ।उन्होंने अपनी आत्मा से अवगुणों को हटाकर आत्मा के स्वभाव रुप गुणों को प्राप्त कर लिया है। मेरे अंदर भी भगवान के समान वे सभी गुण मौजूद हैं, अब मैं भी भगवान की तरह पुरुषार्थ करके भगवान की तरह अनंत गुण वैभव को प्राप्त करूंगा।

राजेश रागी बक्सवाहा ने धर्म सभा की जानकारी देते हुए बताया कि आचार्य श्री ने जैन श्रावकों से कहा कि यदि हमें धर्म प्राप्त करना है तो हमें अधर्म का भी पता होना चाहिए। जब हमें यह पता होगा कि क्रोध अधर्म है तब हम उसे त्याग कर क्षमा धर्म को प्राप्त करने का पुरुषार्थ कर सकेंगे। जब हमें अपने वस्त्र की मलिनता का भान होगा तब ही हम उसे साफ करने व धोने का प्रयास पुरुषार्थ करेंगे। हम अधर्म को जानकर उसे त्याग कर अपनी आत्मा के स्वभाव रूप धर्म को प्राप्त करें। बुधवार को द्वितीय दिवस आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज का ससंघ 25 पिच्छीधारी से अधिक साधु व आर्यिका माताजी सहित विशाल चतुर्विध संघ की आहार चर्या भी सम्पन्न हुई।

आचार्य श्री का ससंघ हीरापुर की ओर हुआ विहार

दोपहर उपरांत आचार्य श्री का संघ सहित हीरापुर की ओर विहार हुआ, रात्रि विश्राम गडोही मे होगा और गुरुवार की आहारचर्या हीरापुर ग्राम में होगी।

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