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एक पल में आदेश्वर पचौरी बन गए मुनि मुमुक्षु सागर... : कपड़े और आभूषणों को छोड़ थाम लिया पिच्छी और कमंडल


एक तरफ वात्सल्य वारिधि बिराजे और दूसरी और मोक्ष मार्ग पर चलने की इच्छा लिए बैठे आदेश्वर पचौरी…आज दीक्षा का पावन दिन था, जैन संस्कार से जुड़े रीति-रिवाज हुए और आदेश्वर पंचौरी बन गए मुनि मुमुक्षु सागर । पढ़िए कैसे धरियावद के आदेश्वर, अपने भरे-पूरे सांसारिक जीवन को त्याग एक पल में बन गए तपस्वी संत


वो दृश्य, जिसने देखा वो शायद ही ताउम्र उसे भूल सकेगा । किशनगढ़ का सूरज देवी पाटनी सभागृह, जहां एक ओर आदेश्वर जी पचौरी दीक्षा की अभिलाषा मन में सजाए बैठे थे और दूसरी और विराट व्यक्तित्व के धनी वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी …।

पिछले दिनों किशनगढ़ में हुए पंचकल्याणक महोत्सव में धरियावद निवासी आदेश्वर जी, आचार्य वर्धमान सागर जी से ऐसे प्रभावित हुए थे कि मौके पर ही खड़े होकर अपनी दीक्षा का निवेदन कर दिया। आचार्य श्री ने वहीं पर उनकी भावनाओं को देख कह दिया कि यहीं किशनगढ़ में ही दीक्षा दी जाएगी । उस दिन से ही मानों आदेश्वर जी, मन ही मन सांसारिक जीवन से खुद को अलग कर संतत्व को प्राप्त हो गए थे । वे अपने सांसारिक जीवन में रहते हुए संत समागमों से अपने मन को पवित्र करते रहे। तरह-तरह की स्व-परीक्षाओं में स्वयं को सिद्ध करते रहे। लेकिन संत होने का मार्ग तो आखिरकार गुरू ही बताते हैं । आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मानों मन ही मन ,उनके जीवन में सबसे बड़े बदलाव का क्षण पहले से निर्धारित कर रखा था।

आज किशनगढ़ में उनके जीवन में वही परम कल्याण का क्षण आया । आदेश्वर पचौरी का दीक्षा महोत्सव कार्यक्रम तीन दिन से चल रहा है । लेकिन आज का दिन हमेशा के लिए लोगों की स्मृतियों में बस गया । क्योंकि आज उन्हें दीक्षा के बाद नया नाम मिला । आदिश्वर अब बन गए हैं मुनि श्री मुमुक्षु सागर…

ऐसे सम्पन्न हुई मुमुक्षु सागर जी दीक्षा


किशनगढ़ में हुए विविध कार्यक्रमों में पहले उन्हें 28 मूलगुणों का संस्कार कर दीक्षा प्रदान की गई । इसमें दीक्षार्थी की गोद भराई, हल्दी,मेहंदी, विधि-विधान, आहार चर्या आदि कार्यक्रम हुए । लगभग साढ़े दस बजे चौक पूरण की विधि पूरी की गई और दीक्षार्थी द्वारा आचार्य श्री को दीक्षा का निवेदन किया । 12.13 मिनट पर दीक्षार्थी की मूल क्रियाओं में सिद्ध आदि भक्ति बोलते हुए, दीक्षा की क्रियाएं प्रारंभ की गई । जिसमें गंधोदक से सिर का शुद्धिकरण किया गया और पंच मुठ्ठी केश लोचन आचार्य श्री द्वारा किया गया । दोपहर 12.35 मिनट पर दीक्षा के मूल संस्कारों का कार्यक्रम शुरु हुआ । उसके पहले चावल से पांच महिलाओं द्वारा चौक पूरण किया गया । उस चौक पूरण पर, दीक्षार्थी आदेश जी को बिठाया गया और केश लोचन आदि क्रियाएं की गई । 12.53 मिनट पर अपने कपड़े व गहनों का उन्होने त्याग किया । आचार्य श्री ने 12.54 मिनट पर आदेश जी के सिर पर स्वास्तिक बनाया और मूल संस्कारों का गहरा लोंग 12.55 मिनट पर रखा । एक बजकर एक मिनट पर, दीक्षार्थी की अंजुलि बनाकर उसमें स्वास्तिक बनाकर चावल,हल्दी, सुपारी,श्रीफल आचार्य श्री ने मंत्रोत्चार के साथ रखा । उसके बाद नामकरण संस्कार दोपहर 1.45 बजे आदेश्वर का नामकरण मुनि मुमुक्षु सागर रखा गया । वहीं मुनि श्री को उदयपुर डागरिया परिवार के विजय,संदीप,हितेश डागरिया ने कमंडल भेंट किया । दीक्षार्थी के माता-पिता बनने का सौभाग्य उनके ज्येष्ठ पुत्र नीलेश-उषा जैन को मिला । मुनि श्री को पिच्छी भेंट हेमन्त पचौरी ने की । वहीं आर.के.पाटनी परिवार ने उन्हें शास्त्र भेंट किया ।

जब पुत्र ने पिता बनकर दीक्षा संपूर्ण करवाई

रोचक और भावुक क्षण उस वक्त आया जब जिस पुत्र को बड़ा किया, उसी पुत्र और उनकी पत्नी ने माता-पिता बनकर, मुनि श्री मुमुक्षु सागर जी की दीक्षा करवाई ।

 

72 वर्ष के वात्सल्य वारिधि, 54 वर्ष दीक्षा काल, अब तक 101 दीक्षाएं


किशनगढ़ में बिराजे वात्सल्य वारिधि जी की उम्र 72 वर्ष है जिसमें 54 वर्ष दीक्षा काल है। परम संतत्व को प्राप्त आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज से दीक्षित संतों की संख्या अब 101 हो गई है । इस काल में आचार्य श्री ने 35 मुनि-35, 40 आर्यिकाएं, एक ऐलक, 13 क्षुल्लक और 12 क्षुल्लिकाओं को दीक्षा दी है ।

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