भारतीय डाक विभाग द्वारा आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के संयम जीवन के 50 वर्ष एवं आचार्य पद पदारोहण के 50 वर्ष पूर्णता के स्वर्णिम अवसर पर देश के विभिन्न शहरों से 200 से अधिक विशेष आवरण जारी किए जो की एक कीर्तिमान है। संग्रहण में कुछ शहरों के छोड़ कर लगभग सभी विशेष आवरण उपलब्ध है जिसको कई जगह प्रर्दशित भी किया गया है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
इंदौर (बदनावर)। लाखों करोड़ों वर्ष के इतिहास में सनातन श्रमण संस्कृति की प्रवाहमान अविरल धारा में अनेकानेक प्रबुद्धाचार्य एवं ऋषि मुनि हुए। जिन्होंने सत्य अहिंसा की अलख को जलाएं रखते हुए पीड़ित मानवता के उत्कर्ष के लिए अभूतपूर्व योगदान दिया। ऐसे ही एक महान आध्यात्मिक योगी इस युग में हुएं जिन्हें पुरा विश्व आचार्य श्री विद्यासागर जी महा मुनिराज के नाम से जानता है।
वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि भारतीय पंचांग के अनुसार अषाढ़ शुक्ल पंचमी (आज ही के दिन) एवं अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 30 जून 1968 को सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर राजस्थान के अजमेर शहर में गुरु ज्ञानसागर जी से मुनि दीक्षा ग्रहण करके भारतवर्ष के आकाश में चमकना शुरू किया और धीरे-धीरे इस सूर्य का प्रकाश देश की सीमाओं को लांघकर संपूर्ण विश्व में एक महान आध्यात्मिक योगी के रूप में फैलता चला गया।
यद्यपि आचार्य श्री इस वर्ष फरवरी माह की 18 तारीख को अपने नश्वर शरीर को छोड़कर समाधिस्थ हो गए परंतु उनका आध्यात्मिक प्रकाश युगों-युगों तक संसार को आलोकित करता रहेगा। आज देश उनका 56वां दीक्षा दिवस मना रहा है।
सरकारें हुई हैं प्रभावित
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आचार्य श्री एकमात्र ऐसे संत है जिन्होंने अपनी आध्यात्मिक चेतना एवं संयमित जीवन को जीते हुए भी स्वदेशी मातृभाषा गौ संरक्षण आयुर्वेद नारीशिक्षा हथकरघा और मूल रूप से भारत को भारत बनाने के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया उनके विचारों से भारत सरकार एवं राज्य सरकार भी अत्यधिक प्रभावित हुई और उनकी बताई हुई कई योजनाओं पर कार्य कर रही है।
भारतीय डाक विभाग द्वारा उनके संयम जीवन के 50 वर्ष एवं आचार्य पद पदारोहण के 50 वर्ष पूर्णता के स्वर्णिम अवसर पर देश के विभिन्न शहरों से 200 से अधिक विशेष आवरण जारी किए जो की एक कीर्तिमान है। पाटोदी के संग्रहण में कुछ शहरों के छोड़ कर लगभग सभी विशेष आवरण उपलब्ध है जिसको कई जगह प्रर्दशित भी किया गया है।
पाटोदी ने बताया कि वर्द्धमानपुर शोध संस्थान द्वारा बदनावर नगर से भी एक विशेष आवरण के लिए आवेदन किया गया था परंतु कुछ तकनीकी समस्या के चलते हुए वह आवरण समय पर जारी नहीं हो सका। इस आवरण पर आचार्य श्री के चित्र के साथ बदनावर भूगर्भ से प्राप्त आदि परमेश्वर भगवान आदिनाथ जी की मनोज्ञ प्रतिमा का चित्र साझा किया गया था।













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