मुनि श्री सुधासागर जी के प्रवचन में सामंजस्य, समानता, सुधारवाद आदि के बारे में श्रद्धालुओं ज्ञान मिला। सोमवार को मुनि श्री ने गोसलपुर में इन्हीं बातों का जिक्र कर मार्गदर्शन प्रदान किया। गोसलपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…
गोसलपुर (मप्र)। मुनि श्री सुधासागर जी ने सोमवार को अपने प्रवचन में कहा कि समाजवाद, प्रजातंत्र, सामान्य दृष्टि, एक रुपता, ये सारे के सारे जितने व्यवहार में सुनने में अच्छे लगते है लेकिन, उपलब्धि में कुछ भी काम मे नहीं आता। यदि सामांजस्य या समानता रखना है तो हमसे जो बड़े है उनकी समानता करने का प्रयास करें। आज के सुधारवादी का सिद्धान्त है कि वे अमीरों की आलोचना करते हैं कि तुम गरीबों की मैचिंग करो। पुण्यहीनों को लेकर चलो, पुण्यहीनों को झुककर चलो, ये जो सिद्धान्त है सुधारवादियों का, यह स्व पर घाती है, इसे जैन दर्शन ने अच्छा नहीं कहा। पीछे चलने वाले के अनुसार यदि हमें अपनी गति मंद करनी पड़े तो पीछे वाले को तो शाम हो ही जाएगी। जो आगे वाला दिन में पहुंचने वाला था उसको भी रात हो जाएगी। पूज्य कुन्दकुन्द स्वामी ने प्रवचनसार ग्रंथ में अष्टपाहुड में कहा कि तुम शिथिलाचारी साधु को देखकर शिथिलाचार का साथ मत दे देना, गुणहीन की संगति मत करना, गुणहीन मत हो जाना। यहाँ तक कहा जो गुणहीन की संगति करता है, वो गुणवान होकर भी गुणहीन कहलाता है। दूध भी यदि शराब की दुकान पर खड़े होकर पियोगे तो बदनामी ही होनी है। तुम कितने पवित्र, पावन बनें रहो, यदि पुण्यहीन, पापी, शिथिलाचारी की संगति में रहोगे तो आप पर लांछन आएगा ही, आपका साथी गलत है तो लोग आपको भी गलत समझेंगे, इसलिए कितने शक्तिमान, ज्ञानवान बन जाओ, हमेशा संगति गुणहीन की नहीं करना।
राग में इतने अंधे मत हो कि विवेक खो दो
एक व्यक्ति को इज्जत बनाने के लिए सारी जिंदगी लग जाये लेकिन, इज्जत बिगाड़ने के लिए एक सेकेंड काफी होता है। सौ गुण एक दुर्गुण ढांक देगा। अच्छाई में इतनी ताकत नहीं है कि वो बुराई को ढांक दे। गुण में इतनी ताकत नहीं है कि वह अवगुणों को ढांक दे लेकिन बुराईयों में जरूर इतनी ताकत है कि वे तुम्हारी अच्छाईयों को ढांक सकती है। राग में इतने अंधे मत हो जाओ कि तुम विवेक खो दो और स्वयं का जीवन खत्म कर दो।
एक पाप करता है, दूसरा पापी हो जाता है
बस यही से धर्म की शुरुआत होती है कि जब लोग राग में इतने डूब जाते है कि सामने वाले को डूबता देखकर स्वयं डूब जाते है, एक पाप करता है, दूसरा पापी हो जाता है। एक झगड़ा करता है तो उसके बदले में दूसरा भी झगड़ा करने लग जाता है और तुम लोग उस झगड़े के पक्ष में खड़े हो जाते हो। आपका बेटा झगड़ा करके आया है और सामने वाला उस पर आरोप लगाने आये तो तुम बेटे के पक्ष में खड़े हो जाओगे, ये भी जानने की चेष्टा नहीं करोगे कि आखिर गलती है किसकी, तुम्हे तो मोह जागेगा, बस यही तुम्हारी बहुत बड़ी मूर्खता है।
50% घर उजड़ने से बच जाएंगे
जो माता-पिता अपनी बिटिया के पक्ष में, मोह में इतने अंधे हो जाते है कि बिटिया की गलती या स्वरूप को जाने बिना बिटिया के मोह में जाकर ससुराल वालों को भला बुरा कहते है। उस बिटिया की जिंदगी बर्बाद हो जाती है, वो बिटिया तुम्हारे गले पड़ जाती है, वो डायवोर्स दे देते है। 90% दाम्पत्य जीवन आपकी बहु के पीहर वाले तोड़ते है। यदि उसी समय माँ- बाप कह दे, नहीं गलती तेरी है, तो 50% झगड़े वही खत्म हो जाएंगे। सुसराल वाले कहेंगे मत डाँटो बिटिया को, ये मेरी बहु है, हो गयी होगी गलती, कोई बात नहीं। 50% घर उजड़ने से बच जाएंगे, हर व्यक्ति अपनों को डांटे, उधर ससुराल पक्ष का ससुर बहु को न डांटे, अपने बेटे को झापड़ लगाए।
तीर्थंकर या गणधर बन जाओगे
माहौल जितना कषाय में बढ़ रहा था, उतना ही प्रेम में बदल जाएगा। परायों को डाँटोंगे तो कषायें बढ़ेगी। जब भी तुमसे या किसी से गलती हो जाये, हमारी गलती है या अपनों की गलती है बस। दूसरे की या दूसरों की गलती हो ही नहीं सकती। ऐसे दुश्मन जो बन रहे हो न, तीर्थंकर या गणधर बन जाओगे। जब जब तुम्हें अपने आप को अपराधी घोषित करने का या सजा मांगने का भाव आवे, समझ लेना तुम बहुत महान हो, बहुत जल्दी भगवान बनने वाले हो। मेरी गलती, मुझे प्रायश्चित मिलें, समझ लेना अच्छे दिन शुरू होने वाले है। यदि तुम्हारी गलती है तो सीधे स्वीकार करों कि मुझे सजा दी जाये और यदि तुम्हारी गलती नहीं है फिर भी गलती सामने खड़े हो जाते हो, उसके बाबजूद भी तुम्हारे अच्छे दिन शुरू हो जायेंगे, इसी का नाम है सतयुग, इसी का नाम है स्वर्ग, इसी का नाम है मोक्ष सांसारिक दृष्टि से
गुणहीन से सामंजस्य नहीं
पति रात में खा रहा है तो तुम भी रात में खाने लग जाओं, उसकी मजबूरी हो सकती है, मात्र राग से, ये रात में खाते है तो मुझे भी रात में खाना पड़ेगा, ये है मिथ्यात्व, ये है तुम्हारी मूर्खता कि वो पाप कर रहा है तो तुम भी पाप में लिप्त हो जाओ। वहाँ तुम कह देना- सब में एक हूँ लेकिन, धर्म मे, गलत कार्य में एक नहीं हो सकती। जब जब हम दूसरे को नहीं तार सकते हैं तो स्वयं तरने का प्रयास करो, हम दूसरे को धर्म मार्ग पर नहीं लगा सकते हैं तो स्वयं धर्ममार्ग को छोड़ने का प्रयास मत करो। पुण्यहीन, गुणहीन से सामंजस्य नहीं।
कमजोर पर दया जरूर करना
कमजोर से दोस्ती मत करना, कमजोर पर दया जरूर करना। जो धन में, ज्ञान में, चारित्र में, इज्जत में, आचार विचार में बराबर हो तो दोस्ती उससे करना। रिश्तेदार उससे बनाना जो तुम्हारी बराबरी का हो, दोनों का कुल एक हो, जाति, धर्म, आचार विचार, भगवान, गुरु, णमोकार मंत्र एक हो, जाओ मैं आशीर्वाद देता हूँ, तुम्हारा संबंध खुश रहे।













Add Comment