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श्रावक को भक्तिवान अहंकार रहित एकाग्र होना चाहिए: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का टोंक के लिए विहार जारी


आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का मंगल विहार टोंक जिले में चातुर्मास के लिए चल रहा हैं। 3 जुलाई को शाम को 7.7 किमी विहार कर रात्रि विश्राम वेयर हाउस जूनिया मोड में हुआ। 4जुलाई को प्रातः 5.7 किलोमीटर विहार कर महात्मा गांधी पब्लिक स्कूल नयागांव पर आहार चर्या हुई। टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


टोंक। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का मंगल विहार टोंक जिले में चातुर्मास के लिए चल रहा हैं। 3 जुलाई को शाम को 7.7 किमी विहार कर रात्रि विश्राम वेयर हाउस जूनिया मोड में हुआ। 4जुलाई को प्रातः 5.7 किलोमीटर विहार कर महात्मा गांधी पब्लिक स्कूल नयागांव पर आहार चर्या हुई। विहार के दौरान आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने अपने धर्म उपदेश में श्रावक की परिभाषा, श्रोता के गुण, ज्ञान के प्रकार की विवेचना कर बताया कि श्रावक की परिभाषा श्रद्धावन ,विवेकवान और क्रियावान होती है। श्रावक श्रोता कैसा होना चाहिए। इसमें एक कथानक के माध्यम से बताया कि श्रोता को वक्ता की बातों को सुनकर मनन कर अपने जीवन में निर्णय लेना चाहिए। ताकि उसे गलत सलाह से उसकी हानि नहीं हो, क्यों कि अलग-अलग वक्ता अलग-अलग सलाह देते हैं। कभी-कभी वह सलाह स्वयं के लिए हानिप्रद हो जाती है। श्रोता शीशे दर्पण के समान, पताका के समान ,स्तंभ के समान और कांटे के समान होते हैं सर्वश्रेष्ठ श्रोता शीशे के समान होते हैं जो वक्ता के चेहरे उपदेश के अनुरूप बातों को जीवन में ग्रहण करते हैं।

स्तंभ के समान श्रोता अपने ही विचारों पर अडिग रहते हैं

पताका जिस प्रकार हवा अनुसार लहराती है, उसी प्रकार कुछ श्रोता कान के कच्चे होकर अलग-अलग वक्ता अनुसार कार्य करते हैं। स्तंभ के समान श्रोता अपने ही विचारों पर अडिग रहते हैं। उन पर किसी के उपदेश का कोई प्रभाव नहीं होता कांटा जिस प्रकार तीखा और नुकीला होता है जो सिर्फ दर्द देता है। कष्ट देता है उसी प्रकार के श्रोता धर्म की वाणी को सुनकर ग्रहण नहीं करते उल्टे धर्म में ही दोष निकालते हैं। इस आधार पर सभी को अपना स्वयं का मूल्यांकन करना चाहिए।

सुनना भी एक कला है

आचार्य श्री ने बताया कि इसी कारण श्रावक को सभी वक्ता की वाणी को सुनकर अपने विवेक को जागृत कर जीवन में पालन करना चाहिए। श्रोता के गुणों के बारे में आचार्य श्री ने बताया कि श्रोता पर धर्म की बातें सुनने का काफी प्रभाव होता है। श्रोता को देखकर, सुनकर, पढ़कर, इसका अनुकरण करना चाहिए क्योंकि, सुनना भी एक कला है। आचार्य श्री ने बताया कि आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के प्रवचन को सुनकर एक व्यसनी ,पाप में लिप्त एक युवक के जीवन में इतना बदलाव आया कि उन्होंने धर्म को समझकर व्रत नियम अणुव्रत, फिर महाव्रत लेकर मुनि श्री पाय सागर जी बनकर जीवन को सार्थक किया। श्रावक श्रोता को भक्तिवान, अहंकार रहित, श्रवण के प्रति रुचि एवं चिंतक मननशील होना चाहिए।

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