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गणिनी विशुद्धमति माताजी का 77 वां अवतरण दिवस : दो दिवसीय कार्यक्रम में नजर आया श्रद्धा भक्ति समर्पण 


गणिनी आर्यिका श्री विशुद्धमती माताजी का 77 वें अवतरण दिवस पर दो दिवसीय कार्यक्रम मंगलवार सैकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में पूर्ण हुआ। मंगलवार की सुबह की बेला से ही भक्तों का आना शुरू हो गया था। कोटा से पढ़िए, यह खबर…


कोटा। नाम विशुद्ध चरित्र विशुद्ध और विशुद्धता की धारी हैं गणिनी आर्यिका विशुद्धमति के चरणों में शत-शत नमन हमारी है जी हां, मैं राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन ‘पार्श्वमणि बात कर रहा हूं। गुरु मां गणिनी आर्यिका श्री विशुद्धमती माताजी के 77 वें अवतरण दिवस की। जिसका हमें था इंतजार, जिसके लिए था मन बेकरार, वो घड़ी आ गई आ गई। गणिनी आर्यिका श्री विशुद्धमती माताजी का 77 वें अवतरण दिवस पर दो दिवसीय कार्यक्रम मंगलवार सैकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में पूर्ण हुआ। मंगलवार की सुबह की बेला से ही भक्तों का आना शुरू हो गया था। गुरु मां की एक झलक पाने एवं उनका आशीष लेने वालों की कतार लगी रही। सुबह की बेला में आयोजन के क्रम में सर्वप्रथम पूर्वाचार्यों को नमन करते हुए अर्घ्य समर्पित किए गए। इसके बाद गुरु मां का रजत द्रव्य समर्पित कर भक्ति नृत्य करते हुए भक्ति उल्लास के साथ पूजन किया गया। पूजन की बेला में सभी भक्त भक्ति से सराबोर रहे।

महिला शक्ति हाथों में धर्म ध्वजा लिए लगा रही थीं जयकारे 

इस आयोजन में आर्यिका विभा श्री माताजी संघ का सानिध्य प्राप्त हुआ। दोपहर की बेला में तलवंडी जैन मंदिर से शोभायात्रा निकाली गई, जो कार्यक्रम स्थल ऐलन सत्यार्थ परिसर पहुंची। इसकी विशेषता यह रही कि इसमें गुरु मां के साथ 25 पिच्छीकाधारी संघ शामिल हुए। महिला शक्ति हाथों में धर्म ध्वजा लिए जयकारे लगाते हुए चल रही थीं। बैंडबाजों की धुन पर भक्ति नृत्य करते हुए श्रद्धालुओं ने पूरे मार्ग को भक्ति रस से भर दिया। अनुभव की पूंजी, विभाश्री सत्यार्थ परिसर में विनयांजली सभा में आर्यिका विभाश्री माताजी ने कहा कि साधु जितना पुराना और अनुभवी होता है, समाज के लिए उतना ही उपयोगी होता है।

अब लक्ष्य प्रभु से पूर्ण मिलन का होना चाहिए

विशुद्धमति माता ने कहा कि पंचमकाल में संघ का संचालन एक बड़ी चुनौती है, जिसे संयम से ही साधा जा सकता है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि जीवन का 77 वर्ष का समय बीत गया, अब लक्ष्य प्रभु से पूर्ण मिलन का होना चाहिए। पट्टगणिनी आर्यिका विज्ञमति माताजी ने गुरु मां की तुलना चंदन के वृक्ष से करते हुए उनके प्रभाव को अक्षुण्ण बताया। उन्होंने कहा माताजी विराट व्यक्तित्व की धनी है। वे विनय और विवेकवान हैं, असाधारण व्यक्तिव फ़िर भी साधारण सी दिखती हैं।

कम बोलना अधिक करना, गुरु मां का व्यक्तित्व

माताजी ने महावीर कीर्ति महाराज को स्मृति में लाते हुए कहा कि उन्होंने माताजी के लिए कह दिया था, माया की मां रोको मत ये दिव्य साधिका है। माताजी ने संघ को संभाला। आचार्यश्री सन्मति सागर जी महाराज के साथ गुरु मां का वर्षायोग 1992 में हुआ। आज भी उनका वरदहस्त है। उन्होंने कहा कि कम बोलना अधिक करना, गुरु मां का व्यक्तित्व है।

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