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प्राकृत भाषा भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल धारा : नैनागिरि में राष्ट्रीय कार्यशाला का हुआ उद्घाटन


केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) तथा प्राकृत भाषा विकास फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में 21 दिवसीय राष्ट्रीय प्राकृत भाषा अध्ययन कार्यशाला का उद्घाटन सत्र गुरुवार को हुआ। यह सत्र केवल एक औपचारिक उद्घाटन नहीं, बल्कि प्राकृत भाषा के पुनर्जागरण का सशक्त उद्घोष सिद्ध हुआ। नैनागिरि से पढ़िए, रत्नेश जैन रागी की यह खबर…


नैनागिरि। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) तथा प्राकृत भाषा विकास फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में 21 दिवसीय राष्ट्रीय प्राकृत भाषा अध्ययन कार्यशाला का उद्घाटन सत्र गुरुवार को हुआ। यह सत्र केवल एक औपचारिक उद्घाटन नहीं, बल्कि प्राकृत भाषा के पुनर्जागरण का सशक्त उद्घोष सिद्ध हुआ। प्रातः प्रारंभ हुए इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न 14 प्रांतों से आए विद्वान, शोधार्थी, शिक्षक एवं प्रतिभागी उपस्थित रहे। जैन तीर्थ नैनागिरि ट्रस्ट कमेटी के मंत्री तथा कार्यशाला के मीडिया प्रभारी राजेश रागी ने बताया कि उद्घाटन की मंगलवेला में आचार्यश्री वसुनंदीजी महाराज द्वारा विरचित प्राकृत स्तुति के सामूहिक उच्चारण से संपूर्ण सभागार आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। इसके पश्चात् राष्ट्रगीत एवं केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगीत के गायन ने राष्ट्रीय चेतना और अकादमिक एकात्मता का भाव जाग्रत किया। अतिथियों ने चित्रानावरण एवं दीप प्रज्वलन कर ज्ञान दीप प्रज्वलित किया।

कार्यशालाएं नई पीढ़ी को अपनी भाषायी जड़ों से जोड़ने का माध्यम 

उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो. यशवंतसिंह ठाकुर ने उद्बोधन में कहा कि प्राकृत भाषा भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल धारा है, जिसके बिना दर्शन, साहित्य और संस्कृति की सम्यक् समझ अधूरी है। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्यशालाएं नई पीढ़ी को अपनी भाषायी जड़ों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. ऋषभचंद जैन फौजदार ने प्राकृत भाषा को लोक और शास्त्र के सेतु के रूप में निरूपित करते हुए कहा कि 21 दिवसीय यह कार्यशाला अध्ययन, चिंतन और शोध की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी।मुख्य वक्तव्य में डी. ब्र. राकेश जैन ने प्राकृत भाषा के व्याकरणिक, दार्शनिक एवं साहित्यिक पक्षों की वैज्ञानिकता को उदाहरणों सहित स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि प्राकृत केवल अतीत की भाषा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की शोधदृभाषा भी है।

कार्यशाला के उद्देश्यों को किया रेखांकित 

उद्घाटन सत्र में अतिथियों एवं प्रशिक्षकों का स्वागत-सम्मान जैन तीर्थ नैनागिरि कमेटी एवं प्राकृत भाषा विकास फाउंडेशन ने परंपरागत विधि से किया। स्वागत भाषण में डॉ. कैलाशचन्द सैनी ने कार्यशाला के उद्देश्यों, संरचना और अपेक्षित उपलब्धियों को रेखांकित किया जबकि, नैनागिरि तीर्थक्षेत्र प्रतिनिधि देवेन्द्र जैन लुहारी ने तीर्थक्षेत्र की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक गरिमा पर प्रकाश डाला।

प्राकृत भाषा भारतीय संस्कृति की प्राण 

प्राकृत भाषा विकास फाउंडेशन का परिचय देते हुए डॉ. आशीष जैन ने प्राकृत भाषा के संरक्षण, प्रशिक्षण और शोध के लिए किए जा रहे सतत् प्रयासों की जानकारी दी। कार्यशाला की रूपरेखा एवं अध्यापकों का परिचय डॉ. धर्मेन्द्र जैन ने प्रस्तुत किया तथा डॉ. सतेंद्र जैन ने कार्यशाला के शैक्षिक, अकादमिक एवं व्यावहारिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह आयोजन प्रतिभागियों के लिए वैचारिक समृद्धि का अवसर बनेगा। कुलगुरु अभिभाषण में प्रो. यशवंतसिंह ठाकुर ने प्राकृत अध्ययन को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक बताया। वहीं अध्यक्षीय भाषण में प्रो. ऋषभचंद जैन फौजदार ने इसे भारतीय भाषायी चेतना के पुनर्संस्कार का सशक्त प्रयास बताया। मुनिश्री शाश्वतसागर जी महाराज ने अपने आशीष वचनों में कहा कि प्राकृत भाषा भारतीय संस्कृति की प्राण है। इस पुनर्जीवित करने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।

संचालन डॉ. आशीष जैन आचार्य ने किया। उद्घाटन सत्र का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ तथा राजेश जैन रागी बकस्वाहा एवं डॉ. प्रभातकुमार दास ने आभार जताया। प्राकृताचार्य श्री सुनीलसागरजी महाराज द्वारा विरचित प्राकृत स्तुति पूर्वक कार्यक्रम को सार्थक पूर्णता प्रदान की। उद्घाटन सत्र ने यह स्पष्ट कर दिया कि 21 दिवसीय राष्ट्रीय प्राकृत भाषा अध्ययन कार्यशाला भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगी।

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