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भगवान शीतलनाथ जी का ज्ञान कल्याणक 18 दिसंबर को : पौष मास की कृष्ण चतुर्दशी को है ज्ञान कल्याणक 


जैन धर्म के 10वें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ जी का ज्ञान कल्याणक इस बार 18 दिसंबर को आ रहा है। पौष मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन भगवान ने केवलज्ञान प्राप्त किया था और अपनी देशना दी थी। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भक्तिपूर्वक धर्म आराधना की जाती है। श्रीफल न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की संकलित और संपादित प्रस्तुति…


इंदौर। जैन धर्म के 10वें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ जी का ज्ञान कल्याणक इस बार 18 दिसंबर को आ रहा है। पौष मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन भगवान ने केवलज्ञान प्राप्त किया था और अपनी देशना दी थी। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भक्तिपूर्वक धर्म आराधना की जाती है। अभिषेक और शांतिधारा के अलावा अन्य विधान पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार किए जाते हैं। जैन मान्यताओं के अनुसार वे एक सिद्ध एक मुक्त आत्मा बन गए, जिसने अपने सभी कर्मों का नाश कर दिया था। जैन मानते हैं कि शीतलनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश में भद्दिलपुर में राजा द्रध्रथ और रानी नंदा के यहां हुआ था। भगवान शीतलनाथ ने भद्रिकापुर में माघ कृष्ण पक्ष की द्वादशी को दीक्षा प्राप्ति की थी। दीक्षा प्राप्ति के पश्चात् तीन महीने तक कठिन तप करने के बाद भद्रिकापुर में ही ‘प्लक्ष’ वृक्ष के नीचे पौष कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को ’कैवल्य ज्ञान’ की प्राप्ति इन्हें हुई। कालांतर में भगवान शीतलनाथ का विवाह हुआ। इसके बाद ही उन्होंने दीक्षा ली और शीघ्र ही केवलज्ञान प्राप्त कर लिया। केवल ज्ञान प्राप्त होने पर भगवान ने देशना देना प्रारंभ किया। उनकी देशना सुनकर अनेक लोगों ने उनसे दीक्षा ली। देश और काल के अनुसार तीर्थंकर भगवान की देशना होती है। भगवान शीतलनाथ जी के बारे में यह भी लिखित साक्ष्य है कि दसवें स्वर्ग में आयु पूर्ण करने के पश्चात श्री शीतलनाथ भगवान का जन्म भारत देश के भरत क्षेत्र में स्थित भद्दिलपुर नगरी में राजा दृढरथ एवं रानी नंदा के यहां हुआ।

भगवान शीतलनाथ जब अपनी माता के गर्भ में थे, तब एक बार उनके पिता, राजा दृढरथ को तीव्र ज्वर हो गया। ज्वर लगभग प्राणघातक था। ज्वर के कारण उन्हें भयंकर पीड़ा हो रही थी। उनके पूरे शरीर आँखों में, माथे, पेट, हर जगह में तीव्र जलन हो रही थी। तभी रानी नंदा, जिनके गर्भ में तीर्थंकर भगवान विराजमान थे ने अपने हाथों से राजा दृढरथ का स्पर्श किया और उस स्पर्श से उनके शरीर की सारी जलन दूर हो गई। उनका पूरा शरीर शीतल और सुखदायक हो गया। इसी घटना के कारण, जब भगवान का जन्म हुआ, तो उनका नाम ‘शीतलनाथ’ रखा गया।

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