समाचार

दिव्य अलौकिक है मल्लिनाथ भगवान के अतिशय: तालनपुर में दिव्य प्रतिमाओं के दर्शन को आते हैं बड़ी संख्या में श्रद्धालु 


जैन दर्शन अति प्राचीन है। इसकी प्राचीनता का प्रमाण अनेकों बार हमें देखने को मिल जाते हैं। आज हम एक पावन तीर्थ क्षेत्र का विवरण बता रहे हैं, जो बहुत ही अतिशयकारी एवं ऊर्जा से ओतप्रोत हैं। ऐसा पावन क्षेत्र है तालनपुर। तालनपुर (कुक्षी) के दर्शन अवश्य करें। तालनपुर से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह रिपोर्ट…


तालनपुर। जैन दर्शन अति प्राचीन है। इसकी प्राचीनता का प्रमाण अनेकों बार हमें देखने को मिल जाते हैं। आज हम एक पावन तीर्थ क्षेत्र का विवरण बता रहे हैं, जो बहुत ही अतिशयकारी एवं ऊर्जा से ओतप्रोत हैं। ऐसा पावन क्षेत्र है तालनपुर। तालनपुर(कुक्षी) के दर्शन अवश्य करें। जैन इतिहास की समृद्ध परंपरा के दर्शन मध्यप्रदेश सहित संपूर्ण भारतवर्ष में मिलते हैं। मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध तीर्थ बावनगजा की प्राकृतिक सुंदरता और 84 फीट उत्तुंग प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेवजी के अपूर्व अतिशय से आच्छादित संपूर्ण निमाड़ और रेवा नर्मदा का तट सांस्कृतिक विविधताओं से भरपूर है। सिद्धक्षेत्र बावनगजा से 35 किमी की दूरी पर कुक्षी नगर से 3 किमी दूर खंडवा-बड़ौदा राजमार्ग पर अतिशय क्षेत्र तालनपुर(कुक्षी) स्थित है। तीर्थ अनेक अतिशयों के कारण विख्यात है। तीर्थंकर मल्लिनाथजी की पांच अद्भुत प्रतिमाएं हैं। क्षेत्र के पारस गंगवाल ने बताया कि वीर निर्वाण संवत 1898 की घटना है, जब खेत में एक किसान का हल अटक गया। बहुत परिश्रम के बाद भी उस हल को निकाल नहीं सका। थक हारकर किसान सो गया। सोते समय उसे स्वप्न आया कि भूमि की खुदाई करो, किसान ने भूमि की खुदाई की तो पाया कि यहां तो मूर्तियां हैं। उसे 13 प्रतिमाएं प्राप्त हुईं। यह समाचार समीपस्थ जैन समाजजन सुसारी कुक्षी को मिला। दिगंबर और श्वेताम्बर जैन समाज ने आपसी सामंजस्य से पांच बड़ी प्रतिमाएं दिगंबर जैन समाज को और छोटी आठ प्रतिमाएं श्वेतांबर जैन समाज में बांट ली।

अन्यत्र नहीं गई प्रतिमाएं 

दोनों समुदाय प्रतिमाएं अपने-अपने ग्रामों में ले जाने के लिए बैलगाड़ी पर रखी, लेकिन उनके प्रयास असफल हुए और दोनों समुदायों ने तालनपुर (कुक्षी) में ही मंदिर बनाने का निश्चित किया। दिगंबर जैन समाज का भव्य विशाल मंदिर खंडवा-बडौदा राजमार्ग पर ही स्थित है, जहां मूलनायक श्री मल्लिनाथ भगवान सहित मल्लिनाथ भगवान की प्राचीन प्रतिमाएं जिन पर संवत 1335 उल्लेख है। गंगवाल ने हमें बताया कि पद्मासन में विराजमान प्रतिमा साढ़े तीन फीट ऊंची है। प्रतिमा के पाषाण का रंग अलग ही हैं। जिसे दर्शनकर ही महसूस किया जा सकता है। अतिशयकारी तीर्थ पर अत्यंत शांति है व सभी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। विस्तृत जानकारी के लिए आप इनसे संपर्क कर सकते हैं। आप अपने आगमन की सूचना ज्ञानचंद जैन, मोहित जैन और पारस गंगवाल को दे सकते हैं।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
4
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page