समाचार

सफल व्यक्ति अपना लोहा मनवा लेता है: मुनि श्री सुधासागरजी महाराज ने सुभाष गंज मैदान में दिया दिव्य संबोधन 


नगर को अयोध्या नगरी बनाने लिए अपने हृदय को पवित्र करना होगा। हमारे यहां प्रभु आएंगे। कार्यक्रम में पंच कल्याणक महोत्सव की पत्रिका का विमोचन किया गया। समन्वय ग्रुप घर-घर जाकर पंच कल्याणक के वस्त्र आभूषण दे रहा है। अशोकनगर से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…


अशोक नगर। हमारे लिए अपनी खुद की अहमियत पहचान चाहिए। तुम अपनी दृष्टि में क्या हो जब तक व्यक्ति अपना स्वयं का मूल्यांकन नहीं करता। उसे अपनी अहमियत का एहसास ही नहीं होता। आपकी कोई कद्र नहीं होगी। यह उद्गार सुभाषगंज मैदान में धर्मसभा में मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि दुनिया मेरी प्रतिभा का मूल्यांकन करें। दुनिया मेरी लायकी को समझे। दुनिया लायक को नालायक बनाने में लगी है किसी को नहीं पड़ी कि वह आपके लायकी का ढोल पीटे यहां तो लोग ना लगाने में लगे हैं लायक को भी नालायक बताते हुए नहीं चूकते तुम्हारे लिए अपनी लायकी दुनिया को बतानी होगी सफल भी वही होता है, जो अपना मूल्यांकन स्वयं कर लेता है और दुनिया से अपना लोहा मनवा लेता है। इस दौरान जैन समाज के मंत्री विजय धुर्रा ने कहा कि हमें अपने नगर को अयोध्या नगरी बनाना है। हमें अपने आप को पवित्र पावन बनना है। तीन लोक के नाम हमेशा से ही परम पावन अयोध्या नगरी में जन्मते हैं। यहां की प्रजा का हृदय अत्यंत पावन होता है हमें भी इस धरती पर परम पिता परमेश्वर को बुलाना है। प्रभु आए तो उसके पहले हमारा नगर दुनिया की सर्वश्रेष्ठ भूमि अयोध्या जी बन जाए। इसके लिए हमें अभी से प्रयास करना होगा। हम अपने आप को जितना पवित्र और पावन बनाएं। उतना ही चमत्कार देखने को मिलेगा।

मुख्य पत्रिका का विमोचन किया 

इस दौरान श्री मद् जिनेन्द्र पंच कल्याणक महोत्सव एवं विश्व शांति महायज्ञ एवं गजरथ महोत्सव की मुख्य पत्रिका का विमोचन जैन समाज अध्यक्ष राकेश कांसल, उपाध्यक्ष अजित बरोदिया, प्रदीप तारई, राजेंद्र अमन, महामंत्री राकेश अमरोद, कोषाध्यक्ष सुनील अखाई, मंत्री शैलेंद्र श्रागर, मंत्री विजय धुर्रा, मंत्री संजीव भारिल्य, मीडिया प्रभारी अरविंद कचनार, ऑडिटर संजय केटी, संयोजक मनोज रन्नौद, उमेश सिंघई, मनीष सिंघई श्रेयांस घैला, थूवोनजी अध्यक्ष अशोक जैन टींगू, मिल महामंत्री मनोज भैसरवास, विपिन सिंघई समन्वय ग्रुप के साथियों ने किया। महोत्सव के वस्त्र आभूषण धोती दुपट्टा सहित अन्य आभूषण समन्वय ग्रुप के सभी सदस्यों घर-घर पहुंच कर देने का संकल्प लेकर मुनिश्री से आशीर्वाद प्राप्त किया।

ऊंची दुकान और फीके पकवान जैसी स्थिति से बचें

मुनिश्री ने कहा कि दुनिया मेरी जिंदगी का मूल्यांकन करें मैं बहुत मूल्यवान वस्तु हूं। जब में मूल्यवान कहता है तो ऐसा ना हो कि तुम्हें मूल्यांकन समझाकर तुम्हारे यहां कोई आए ही ना इसलिए आचार्य श्री कुंदकुंद स्वामी ने कहा कि जहां उन्होंने कहा था कि तू भगवान चैतन्य घन स्वरूप आत्मा हूं। ऐसा सुनकर लोगांे ने आपकी दुकान पर आना ही बंद कर दिया। अपनी वस्तु की कीमत घोषित करने के पहले जरा बाजार के भाव को देख तुम अपने आप को भगवान घोषित कर रहे हो। जरा अपने आप को देखो पहले भगवान का स्वरूप देखो, भगवान के लक्षण देखो, ऊंची दुकान और फीके पकवान जैसी स्थिति नहीं बनाना, हमारे पास राग द्वेष बहुत है। यदि तुम्हारे पास राग द्वेष की एक भी कड़िका है तो तुम अपने आप को प्रभु के समकक्ष नहीं हो सकते। मार्ग तो यही है यही से चल कर आप भगवान बन सकते हैं लेकिन, इसके लिए आपको आप को झोंकना होगा।

’संसार में तुम्हें कोई छोड़ना नहीं चाहता’

उन्होंने कहा कि संसार में तुम्हें कोई छोड़ना नहीं चाहता। आप अपने बेटे को थोड़ी सी छूट दे दी और यदि उसने छूट का फायदा उठाकर जो तुम्हारे लिए जो नहीं करना था। वह कर दिया। पिता का कर्त्तव्य है कि वह अपने बेटे को पतन की ओर ना धकेले। सही मार्ग तो है कि पिता बेटे को सही राह दिखायें कुछ बेटे ऐसे भी होते हैं, जिनकी पहचान बेटों से होती है। आज ये मंच पर बैठे हैं। ऐलक जी महाराज आपको देखकर कैसा लग रहा है। हम ख़ुद घर से भागकर आए आप ही बताइए भैया आपको कैसा लग रहा है। यही तो वह बात है कि दुनिया यहां दीवानी हो कर आती है और खुशी-खुशी जाती है।

बढ़े तुम्हारी प्रसंशा करेंगे आपको प्रशंसा से दूर रहना है

उन्होंने कहा कि बेटे तुम्हारी प्रसंशा करेंगे आपको प्रशंसा में नहीं पड़ना है। यदि आप अपनी प्रसंशा सुनकर छोटे आदमी थोड़ी प्रशंसा सुनकर भूलकर कूप्पा हो जाए तो समझ लेना। अब आपका विकास रुक गया। सारी दुनिया आपकी प्रशंसा करें तो फूल जाना। यदि बड़े आपकी प्रशंसा करें तो आप अपनी नजर नीची कर लेना एक विद्वान के चार बेटे थे सुंदर गुणवान सुशील थे लेकिन, तोतली बोली थी। उनके विवाह नहीं हो रहे थे। उनके पिता ने विवाह प्रस्ताव लेकर आने वालों के सामने मौन रहने को कहा लेकिन, प्रशंसा सुनकर वह बोल पड़े हम विफल क्यों होते है। उसमें सबसे बड़ी हम अपनी प्रशंसा सुनकर भूलकर मद मस्त नहीं होना है। अपने मन में प्रशंसा का भाव आता है यही से आपकी प्रगति रुक जाती है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
1
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page