जैन धर्म, जैन संस्कृति, संस्कार को संरक्षित करने के लिए गुरु, देव और शास्त्र जरूरी है। स्वाध्याय के बिना बहिरात्मा अंतरात्मा नहीं बन सकती। यह सारत्व रविवार को श्री 1008 दिगंबर जैन चैत्यालय गुप्ति सदन कालानी नगर में विद्वत संगोष्ठी एवं अलंकरण समारोह में निकलकर सामने आया। इंदौर से पढ़िए, रेखा संजय जैन की यह खबर…
इंदौर। संतों और शास्त्रों के पास ही हर समस्या का समाधान है। समस्याओं के कारण भी हम हैं और इसका निदान भी हम ही कर सकते हैं। जैन धर्म, जैन संस्कृति, संस्कार को संरक्षित करने के लिए गुरु, देव और शास्त्र जरूरी है। स्वाध्याय के बिना बहिरात्मा अंतरात्मा नहीं बन सकती। यह सारत्व रविवार को श्री 1008 दिगंबर जैन चैत्यालय गुप्ति सदन कालानी नगर में विद्वत संगोष्ठी एवं अलंकरण समारोह में निकलकर सामने आया। संगोष्ठी में विद्वत जनों ने दिगंबर रथ के दो पहिए श्रमण और श्रावक विषय के अंतर्गत वर्तमान चुनौतियां, कारण और निवारण पर अपने बोधगम्य विचारों से विषय परावर्तन किया। कार्यक्रम का आयोजन अखिल भारतीय दिगंबर जैन महिला संगठन और तीर्थंकर ऋषभदेव विद्वत महासंघ के तत्वावधान में किया गया।
कार्यक्रम आर्यिका श्री यशस्विनी मति माता जी ससंघ के सानिध्य में हुआ। इस अवसर पर अतिथि डॉ. अनुपम जैन, सामाजिक संसद के संरक्षक कैलाश वेद, शीतल तीर्थ रतलाम से ब्रह्मचारी सविता जैन, पूर्व प्राचार्य सुशीला सालगिया ने अपने विचारों से अवगत करवाया। कार्यक्रम में डॉ. अनुपम जैन ने कहा कि जैन धर्म के सभी पुराणों में चतुर्वेदी संघ की अवधारणा को अपनाने के लिए कहा है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म के चार स्तंभ हैं। जिसमें साधु आर्यिका, श्रावक और श्राविका को रखा गया है, उन्होंने कहा कि आर्यिका महावृत्ति होती हैं। मयूर पिच्छी हमारी पहचान है। उन्होंने जैन समाज में व्याप्त समस्याओं के समाधान के लिए अपने घर से ही शुरुआत करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि आज घरों में बहुओं को चौका लगाने का प्रशिक्षण देना चाहिए।
युवा वक्ता रोशन जैन ने कहा कि अब चुनौतियां चुनौतियां नहीं रही। बल्कि विकराल हो गई है। आज कार्यक्रम में हमारे बीच युवा दिखाई नहीं देते हैं। उन्होंने समाज की घटती जनसंख्या, स्वाध्याय में कमी पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि मां जिनवाणी में हर समस्या का समाधान है। युवा मां जिनवाणी के स्वाध्याय से भागते हैं। वहीं वरिष्ठ समाजसेवी और सामाजिक संसद के संरक्षक कैलाश वेद ने संबोधित करते हुए कहा कि जैन समाज में समस्याएं नहीं हैं। उन्हें हमने ही खड़ा किया है। हमने जिनवाणी को समझा नहीं है। हमने जिनवाणी छोड़कर जनवाणी को पकड़ लिया है। उन्होंने श्रावक और श्रमण को ही दिगंबर समाज का वास्तविक संरक्षक बताया है।
ब्रह्मचारी बहन सविता जैन ने मातृ शक्तियों का आह्वान किया कि वे गर्भावस्था में ही मंदिर आकर पूजन आदि करें तो बच्चे संस्कारी होंगे। उन्होंने कहा कि हमें सामूहिक परिवार में रहना सीखना होगा। कार्यक्रम में सुशीला सालगिया आदि ने संबोधित किया। इस अवसर पर आर्यिका श्री यशस्विनी माताजी को शुभ तरंगिणी उपाधि से अलंकृत किया गया। कार्यक्रम का संचालन उषा पाटनी ने किया। आभार भी व्यक्त किया।













Add Comment