धर्मनगरी गींगला में मुनि अपूर्व सागरजी, मुनि अर्पित सागरजी व मुनि विवर्जित सागरजी के सानिध्य में तीन लोक महामंडल विधान का समापन विश्वशांति महायज्ञ के साथ हुआ। शोभायात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए और पिच्छिका परिवर्तन समारोह में अनेक पुण्यशाली परिवारों ने सहभागिता की। पढ़िए अनिल स्वर्णकार की रिपोर्ट…
गींगला (उदयपुर)। धर्मनगरी गींगला में मुनि अपूर्व सागरजी, मुनि अर्पित सागरजी और मुनि विवर्जित सागरजी महाराज के सानिध्य में चल रहे तीन लोक महामंडल विधान का समापन सोमवार को विश्वशांति महायज्ञ के साथ हुआ। प्रतिष्ठाचार्य पंडित विशाल जैन धरियावद के निर्देशन में इंद्र-इंद्राणियों ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ में आहुतियां अर्पित कीं।
भगवान आदिनाथ की पालकी को बैंड-बाजों की भक्तिमय धुनों के साथ शेरावत वाटिका से श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर तक भव्य शोभायात्रा के रूप में निकाला गया, जिसमें नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए हजारों श्रद्धालु शामिल हुए।
प्रवक्ता अनिल स्वर्णकार ने बताया कि दोपहर में शेरावत वाटिका में मुनि संघ के सानिध्य में पिच्छिका परिवर्तन समारोह का आयोजन हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत चित्र अनावरण, दीप प्रज्ज्वलन, पाद प्रक्षालन और अष्टद्रव्य पूजन से हुई। इस अवसर पर मुनि अपूर्व सागर, मुनि अर्पित सागर और मुनि विवर्जित सागर महाराज को क्रमशः धनराज सवलाल खरकिया, ईश्वरलाल कन्हैयालाल बंबोरिया (गींगला) और लक्ष्मीलाल कालूलाल जोलावत (सराड़ी) ने नवीन पिच्छिकाएं भेंट कीं।
समारोह में गींगला, उथरदा, सराड़ी, सलूंबर, भिंडर, गुडेल, कानपुर, लकड़वास, बंबोरा और मुंबई से आए श्रद्धालुओं ने भाग लिया। मुनि अपूर्व सागरजी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि दिगंबर साधु केवल तीन उपकरणों—ज्ञान के लिए शास्त्र, शौच के लिए कमंडल और संयम के लिए पिच्छिका—का ही उपयोग करते हैं। पिच्छिका उनके लिए अहिंसा और करुणा का प्रतीक है।
उन्होंने बताया कि मयूर पिच्छिका सबसे कोमल साधन है, जिससे सूक्ष्म जीवों की रक्षा होती है। यही कारण है कि बिना पिच्छिका के साधु सात कदम भी नहीं चलते। समारोह का समापन श्रद्धा, भक्ति और संयम के भावों के साथ हुआ, जिसमें हजारों जैन समाजजन साक्षी बने।













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