सहस्त्रनाम मंडल विधान के दौरान आचार्य वर्धमान सागर जी ने बताया कि भगवान ने द्रव्य, भाव और नौ कर्म रूप तीन पुर — जन्म, जरा और मरण रूपी नगर को नष्ट किया है। पूजन में भगवान के 1008 नामों का गुणानुवाद किया गया। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…
टोंक। आचार्य वर्धमान सागर जी के सान्निध्य में सहस्त्रनाम मंडल विधान की पूजा 28 अक्टूबर से प्रारंभ होकर 1 नवंबर को हवन के साथ संपन्न होगी। आचार्य श्री ने प्रवचन में कहा कि पूजन के माध्यम से भगवान के विभिन्न नामों से गुणानुवाद किया गया है — जिनमें चिंतामणये, अभीष्टदाय, अजीताय, जिनेंद्राय, परमानंदाय जैसे नाम आत्मकल्याण का संदेश देते हैं।
उन्होंने कहा कि जिनेंद्र भगवान के चरणों का स्मरण करने से राग, द्वेष और कर्मों की कालिमा मिट जाती है। भगवान की ध्वनि अमृत के समान है जो जीव को भवाग्नि से मुक्त करती है। पूजन की आठवीं और नौवीं पूजा में अष्ट प्रातिहार्य और समवशरण के वैभव का उल्लेख किया गया।
आचार्य श्री ने बताया कि भगवान त्रिपुरारी ने द्रव्य, भाव और नौ कर्म रूपी जन्म, जरा और मरण नगर को नष्ट कर दिया — यही मोक्ष का सार है। विधान में इंद्रों द्वारा धार्मिक क्रियाएं संपन्न की गईं। सौंधर्म इंद्र श्री कजोड़मल पारसमल बगड़ी, कुबेर इंद्र श्री नंदलाल, संजय संघी सहित अनेक इंद्रों ने सहभागिता की।
विधान में अध्र्य अर्पित किए गए और मंत्रोच्चार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी एवं मुनि हितेंद्र सागर जी द्वारा किया गया। आचार्य श्री का संघ सहित 3 नवंबर को श्री आदिनाथ जिनालय नसिया में प्रवेश होगा, जहां दीर्घकालीन नियम-व्रत लेने वाले श्रावक-श्राविकाओं को विशेष आशीर्वाद प्रदान किया जाएगा।













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