आचार्य श्री विद्यासागरजी महामुनिराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज एवं मुनि श्री संधान सागर महाराज के ससंघ सानिध्य में श्री 1008 श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान (संस्कृत बीजाक्षरों युक्त) का शुभारंभ हुआ। भोपाल से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…
भोपाल। आचार्य श्री विद्यासागरजी महामुनिराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज एवं मुनि श्री संधान सागर महाराज के ससंघ सानिध्य में श्री 1008 श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान (संस्कृत बीजाक्षरों युक्त) का शुभारंभ हुआ। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि कार्यक्रम की शुरुआत सुबह 6 बजे मुनि संघ के सान्निध्य में घटयात्रा के साथ हुई। सभी महिलाएं इंद्राणिओं की विशेष वेशभूषा में सिर पर चांदी तथा अन्य धातु के मंगलकलश धारण कर चल रही थीं। वही पुरुषवर्ग भी विशेष वस्त्रों से सुसज्जित होकर धर्म ध्वजा को धारण कर चल रहे थे। समूचे अवधपुरी का वातावरण सूर्य की प्रथम रश्मि से ही धर्ममय हो गया। घटयात्रा वापस आयोजन स्थल पर वापस आई एवं कत्थावाला परिवार कानपुर द्वारा ध्वजारोहण संपन्न हुआ। इसके बाद मंडप उदघाटन एवं सकली करण की क्रियाएं संपन्न हुई। विद्याप्रमाण गुरुकुलम् जिनालय से जब चातुर्मास चकृवर्ती तथा चातुर्मास के नवरत्न एवं मंडलों के पुण्यार्जक अपने सिर पर श्री जी को विराजमान कर पांडाल की ओर आगे बढ़ रहे थे तो उनके साथ चल रहे श्रावक प्रभु की जयजयकार कर रहे थे एवं इंद्राणियां मंगलकलश धारण कर मंगल गीत गाते हुए चल रही थीं। अवधपुरी का यह दृश्य किसी स्वर्गलोक जैसा शोभायमान हो रहा था।
सिद्ध परमात्माओं की वृहद स्तुति करने वाला विधान है
विधानाचार्य एवं संगीतकार की स्वरलहरियों के साथ कार्यक्रम की शुरूआत हुई। पांडुक शिला पर अभिषेक विधि को संपन्न कराया गया एवं मुनि श्री के मुखारबिंद से विश्व में शांति स्थापित हो कि मंगलभावना से शांतिधारा हुई। इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान की महिमा को सुनाते हुए कहा यह सर्व विधानों में श्रेष्ठतम सभी प्रकार की विघ्न बाधा को दूर करने वाला तथा विशुद्धि को बढ़ाने वाला सभी सिद्ध परमात्माओं की वृहद स्तुति करने वाला विधान है। उन्होंने कहा कि यहां पर श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान की स्थापना मूल बीजाक्षरों से युक्त मंत्र एवं ‘अ‘ से लेकर ‘ह’ तक सभी अक्षरों के साथ की गई है,जो इस बात का प्रतीक है।,लोक में जितने भी मंत्र है उन सभी मंत्रों के बीज यंहा इस मंडल में मौजूद है। उन सभी मंत्रों की आराधना इन आठ दिनों में यहां पर संपन्न होगी।
आपकी अंतरंग की शुद्धि होगी, जो कि कर्म निर्जरा का साक्षात कारण बनेगा
मुनिश्री प्रमाणसागर जी ने कहा कि विश्व की वह समस्त शक्तियां यहां पर प्रतिष्ठापित होंगी। मुनि श्री ने कहा विधान में प्रतिदिन पूजन, जाप्यानुष्ठान,और हवन तीनों होते हैं। इसमें से यदि कोई एक भी कम है तो वह विधान नहीं केवल पूजन कहलाएगी। उन्होंने कहा कि आप लोग जितनी अधिक भाव विशुद्धि रखेंगे। उतनी ही आपकी अंतरंग की शुद्धि होगी, जो कि कर्म निर्जरा का साक्षात कारण बनेगा तथा उनके जीवन में धर्मानुराग बड़ने से परिवर्तन आऐगा एवं दुःख दारिद्र नष्ट होकर सभी प्रकार की विघ्न बाधाएं नष्ट होंगी।
आप अपनी शुद्धि का ध्यान रखते हुए विशुद्धि को बढ़ाइए
मुनि श्री ने कहा कि अब यह मात्र साधारण पांडाल नहीं है। यह एक समवसरण का रूप ले चुका है। 48 जिनबिंब विराजमान हैं। यहां की ऊर्जा अनंतगुना बढ़ चुकी है तथा जैसे-जैसे प्रभु भक्ति आगे बढ़ेगी। यहां की ऊर्जा भी अनंतगुणा बढ़ती जाएगी। आप सभी साधारण मनुष्य नहीं बल्कि स्थापना नियोग से सौधर्म इंद्र एवं इंद्राणिओं के रुप में हैं। आपके साथ चतुर निकाय के देव भी प्रभु की भक्ति कर रहे हैं। आप अपनी शुद्धि का ध्यान रखते हुए विशुद्धि को बढ़ाइए। उन्होंने सभी कार्यकर्ताओं को अनुशासन एवं शुद्धि का विशेष निर्देश देते हुए कहा कि पांडाल में किसी भी प्रकार की अशुद्धि नहीं रहना चाहिए। यदि यहां पर अशुद्धि होगी तो वह संकलेष का कारण बनेगा और उससे उल्टा कर्म वंध होगा। इसलिये सभी लोग भाव विशुद्धि के साथ अंतरंग की शुद्धि को बनाये रखें। इस अवसर पर समस्त क्षुल्लक मंचासीन रहे।
प्रतिदिन अभिषेक और शांतिधारा होगी
कार्यक्रम का संचालन विधानाचार्य अभय भैया एवं सहायक अमित वास्तु इंदौर ने किया। प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया प्रतिदिन प्रात 6 बजे मंगलाष्टक के साथ भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा प्रारंभ होगी। इसके बाद महा पूजा एवं मध्य में 8.30 से 9.20 बजे तक मुनि श्री का मांगलिक उदबोधन एवं विधान प्रारंभ होगा तथा प्रतिदिन 11 बजे तक समापन होगा। सांयकाल 6. 20 से शंकासमाधान एवं 7.30 से मंगल आरती होगी। विद्याप्रमाण गुरुकुलम् एवं विद्यासागर प्रवंधकीय संस्थान के सभी पदाधिकारियों ने भोपाल जैन समाज से सभी धार्मिक क्रिआओं में भाग लेने की अपील की है।













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