महात्मा गांधी का जीवन केवल राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि जैन सिद्धांतों और साधु-साध्वियों की प्रेरणा से गहराई तक प्रभावित था। सत्य, अहिंसा, सादगी और शाकाहार उनके जीवन के मूल तत्व बने। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
अहिंसा पुजारी महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को सत्य और अहिंसा के आधार पर लड़ा और अंग्रेजों की गुलामी से देश को मुक्त कराया। गांधी जी का जीवन जैन संस्कारों से गहराई तक प्रभावित था।
जब मोहनदास करमचंद गांधी विदेश जाने के लिए तैयार हो रहे थे, उनकी माता पुतलीबाई ने अनुमति देने से मना कर दिया। बाद में स्थानकवासी जैन मुनि बेचरदास जी स्वामी के समक्ष गांधी जी ने माँस, मदिरा और परस्त्री सेवन त्यागने की तीन प्रतिज्ञाएँ लीं। इसके बाद ही उनकी माता ने विदेश यात्रा की अनुमति दी। गांधी ने इसे अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग (पृष्ठ 32) पर उल्लेखित किया है।
महात्मा गांधी जन्म से जैन नहीं थे, परंतु वे आत्मा से जैन जैसे जीवन जीते थे। शाकाहार, सादगी, सफेद सूती वस्त्र और अहिंसा उनके जीवन की पहचान रहे। उन्होंने जैन सिद्धांतों को सामाजिक और राजनीतिक जीवन में उतारकर उन्हें जनमानस तक पहुँचाया।
गांधी पर श्रीमद राजचंद्र का गहरा प्रभाव था। दोनों के बीच लम्बा पत्राचार हुआ और गांधी ने स्वयं कहा कि नैतिक जीवन में स्थिर रहने की प्रेरणा उन्हें राजचंद्र जी से मिली। वीरचंद गांधी भी उनके सहयोगी रहे, जिन्होंने 1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में जैन परंपरा का प्रतिनिधित्व किया।
1944 में गांधी जी ने स्थानकवासी जैन साध्वी श्री उज्ज्वला कुँवर जी के साथ 19 दिनों तक धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर गहन वार्ता की। यह प्रसंग इतिहास में “गांधी उज्ज्वल वार्ता” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
गांधी जी ने एक अवसर पर अपने मौन दिवस में सोचा कि क्या वे स्वयं साध्वी जी को आहार दे सकते हैं। जब साध्वी जी ने अनुमति दी तो गांधी जी ने अहोभाव और भक्ति भाव से आहार-जल समर्पित किया और कहा कि “आज मैंने महान पुण्य का उपार्जन किया है।”
निस्संदेह, महात्मा गांधी का जन्म भले ही जैन परिवार में न हुआ हो, परंतु उन्होंने अपने जीवन में जैन गुणों और सिद्धांतों का पालन करते हुए ही जीवन जिया।
फोटो: महासती श्री उज्ज्वला कुँवर जी को आहार कराते महात्मा गांधी।













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