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तूमेन का ‘बैठा देव’ : आस्था और इतिहास का संगम : भगवान आदिनाथ की प्राचीन प्रतिमा पुनर्संस्कार और पंचकल्याणक के साथ पुनः विराजित


अशोकनगर जिले के तूमेन गाँव में विराजमान भगवान आदिनाथ की प्रतिमा “बैठा देव” न केवल जैन परंपरा का प्रतीक है, बल्कि स्थानीय और जैन समाज की आस्था का केंद्र बन चुकी है। 2023 में इसका पुनर्संस्कार एवं पंचकल्याणक सम्पन्न हुआ। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…


अशोकनगर जिले का छोटा-सा गाँव तूमेन आज पूरे जैन समाज और स्थानीय समुदाय के बीच अपनी अलग पहचान बना चुका है। यहाँ स्थित श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान भगवान आदिनाथ की प्रतिमा को लोग प्रेमपूर्वक “बैठा देव” के नाम से जानते हैं।

यह प्रतिमा कोई साधारण मूर्ति नहीं, बल्कि सदियों पुरानी जैन परंपरा का सजीव प्रमाण है। इतिहासकार मानते हैं कि यह प्रतिमा लगभग पाँच सौ वर्ष या उससे भी अधिक प्राचीन है। लंबे समय तक यह खंडित अवस्था में रही और उपेक्षा का शिकार होती रही। किंतु स्थानीय समाज की आस्था और कुछ संस्थाओं के प्रयासों ने इसे नया जीवन प्रदान किया।

तूमेन, जिसे प्राचीनकाल में “तुम्बवन” कहा जाता 

साल 2023 में इस प्रतिमा का जीर्णोद्धार एवं पुनर्संस्कार कार्य सम्पन्न हुआ। संस्कृति संवर्धन चैरिटेबल ट्रस्ट, इंदौर के सहयोग से प्रतिमा को पुनः स्थापित किया गया। 1 जून 2023 को आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज के सान्निध्य में लघु पंचकल्याणक महोत्सव का आयोजन किया गया। उस समय तूमेन और आसपास के गाँवों एवं नगरों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुँचे थे। पुरातत्वविदों का मानना है कि तूमेन, जिसे प्राचीनकाल में “तुम्बवन” कहा जाता था, जैन संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ कभी भव्य जैन मंदिर रहा होगा, जिसके अवशेष आज भी बिखरे पड़े हैं। भगवान आदिनाथ की यह प्रतिमा और अन्य छोटे मूर्ति-खंड इस बात का प्रमाण हैं कि तूमेन जैन कला और स्थापत्य का प्रमुख स्थल रहा है।

आज “बैठा देव” केवल एक प्राचीन प्रतिमा नहीं, बल्कि गाँववासियों और जैन समुदाय के लिए जीवंत आस्था का प्रतीक बन चुकी है। प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। पर्व, त्यौहार और रविवार को विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है।

“बैठा देव” न केवल तूमेन की धार्मिक पहचान है, बल्कि यह उस संस्कृति और धरोहर का प्रतीक भी है जो मध्य प्रदेश की मिट्टी में गहराई से रची-बसी है। इस प्रतिमा का जीर्णोद्धार और पुनर्स्थापना यह संदेश देती है कि चाहे समय कितना भी बदल जाए, आस्था और परंपरा कभी नष्ट नहीं होती, बल्कि और अधिक प्रखर होकर सामने आती है।

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