महरौनी स्थित श्री दिगंबर जैन महावीर पंचबालयति जिनालय में दस दिनों तक चले दशलक्षण पर्व का समापन क्षमावाणी पर्व के साथ श्रद्धा और भक्ति पूर्वक हुआ। समापन अवसर पर पं. कैलाशचंद जैन शास्त्री ने क्षमा धर्म की महत्ता पर प्रकाश डाला। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की खास रिपोर्ट…
महरौनी के श्री दिगंबर जैन महावीर पंचबालयति जिनालय में आयोजित दशलक्षण महापर्व का समापन क्षमावाणी पर्व के साथ बड़े उत्साह और श्रद्धा भाव से हुआ। इस अवसर पर बीकानेर से पधारे शिक्षा विभाग के सहायक निदेशक (सेवानिवृत्त) पं. कैलाशचंद जैन शास्त्री ने स्वाध्याय सभा को संबोधित करते हुए कहा कि ‘क्ष’ का अर्थ है क्षमा करना, ‘मा’ का अर्थ है मान और कषायों का त्याग, जबकि ‘वाणी’ का अर्थ है वचनों में कषायों का अभाव रखना। यही वास्तविक क्षमावाणी है।
उन्होंने कहा कि मन, वचन और काय से हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगना और दूसरों को क्षमा करना ही क्षमा धर्म धारण करना है। क्षमा आत्मा का धर्म है और यदि भूल स्वीकार कर भविष्य में न दोहराने का संकल्प लिया जाए तो क्षमा याचना सार्थक होती है। शास्त्रीजी ने यह भी प्रेरणा दी कि क्षमावाणी पर्व केवल कार्ड या औपचारिकता तक सीमित न होकर व्यवहारिक जीवन में उतरना चाहिए।
दस दिवसीय पर्व में प्रतिदिन प्रातः श्री समयसार ग्रंथ के आधार पर आश्रव-बन्ध अधिकार की व्याख्या हुई। दोपहर में विविध विषयों पर चर्चाएं और रात्रि में आचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों के आधार पर धर्मोपदेश हुए। मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन और ब्रह्मचर्य धर्म की गहन व्याख्या की गई।
शास्त्रीजी ने बताया कि इच्छाओं का निरोध ही तप है और आत्मा में रमण करना ही ब्रह्मचर्य है। दैनिक कार्यक्रमों में जिनेंद्र भगवान का अभिषेक-पूजन और दशलक्षण महामंडल विधान भी संपन्न हुआ। अंत में क्षमापना के साथ पर्व का समापन हुआ। इस आयोजन में स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट परिवार का विशेष सहयोग रहा।













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