मुनिराजों सहित आचार्यश्री की धर्मसभा का धर्मानुरागी समाजजन भरपूर पुर्ण्याजन कर रहे हैं। यहां नित प्रवचनों की श्रृंखला में मुनिराज जीवन को उत्तम बनाने और आत्म कल्याण के मार्ग बता रहे हैं। पथरिया से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर…
पथरिया। पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ का चातुर्मास विरागोदय तीर्थ पथरिया में जारी है। मुनिराजों सहित आचार्यश्री की धर्मसभा का धर्मानुरागी समाजजन भरपूर पुर्ण्याजन कर रहे हैं। यहां नित प्रवचनों की श्रृंखला में मुनिराज जीवन को उत्तम बनाने और आत्म कल्याण के मार्ग बता रहे हैं। अरिहंत जैन भैया जी ने बताया कि पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज जी के शिष्य विचित्र बाते प्रणेता मुनिश्री सर्वार्थ सागरजी महाराज ने प्रवचन में कहा कि हमारे जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति है और इस यात्रा में त्याग एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है।
जैन धर्म के अनुसार, त्याग केवल भौतिक चीज़ों का नहीं, बल्कि हमारे मन, ममता, और इच्छाओं का त्याग है। जब तक हम अपने भीतर के राग-द्वेष, क्रोध और अहंकार को छोड़़ नहीं पाते, तब तक हम सच्चे धर्म की दिशा में नहीं बढ़ सकते। भगवान महावीर ने कहा था कि जब तक मनुष्य स्वार्थ और आस्थाओं से मुक्त नहीं होता, तब तक उसे शांति नहीं मिल सकती। वह शांति, जो हमारे भीतर ही छिपी हुई है, उसे पाने के लिए हमें अपने स्वार्थ और लालसाओं का त्याग करना होगा।
त्याग मोह-माया से मुक्त करता है
त्याग केवल वस्तुओं का छोड़ना नहीं, बल्कि वह शक्ति है, जो हमें संसार के मोह-माया से मुक्त करती है। जब हम किसी के भले के लिए अपनी इच्छाओं को छोड़ते हैं, तब हमारी आत्मा का शुद्धिकरण होता है। त्याग की असली पहचान यह है कि, जो चीज़ें हमें बांधती हैं। जैसे हमारी धरोहर, हमारी पहचान, हमारी खुशियां, उन्हें हम भगवान की सेवा के लिए सहजता से छोड़ दें। यही सच्चा त्याग है, और यही हमें धर्म के उच्चतम मार्ग पर ले जाता है।
आंतरिक शांति की दिशा में एक कदम और बढ़ाएं
इसलिए, दोस्तों, जो लोग त्याग के मार्ग पर चलते हैं, वे न केवल अपनी आत्मा को पवित्र करते हैं, बल्कि समाज और संसार के लिए भी प्रेरणा बन जाते हैं। आइए, हम भी हर दिन कुछ न कुछ त्याग करेंकृ चाहे वह थोड़ा क्रोध हो, थोड़ा अहंकार हो, या फिर छोटी-छोटी इच्छाएं और अपने जीवन को सच्चे धर्म और आंतरिक शांति की दिशा में एक कदम और बढ़ाएं।













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