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तप में निराकुलता है इससे ही आनंद है : पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज ने कहा वही तप जिन शासन में श्लाघनीय है, जो आत्मा कल्याण करे 


पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ का मंगल चातुर्मास विरागोदय तीर्थ पथरिया में चल रहा है। यहां पर पर्युषण पर्व के दौरान दसलक्षण महोत्सव के तहत मुनिराजों के प्रवचनों और नित पूजन, अभिषेक, शांतिधारा, भक्ति, आराधना का दौर जारी है। पथरिया से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की यह खबर…


विरागोदय तीर्थ पथरिया। पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ का मंगल चातुर्मास विरागोदय तीर्थ पथरिया में चल रहा है। यहां पर पर्युषण पर्व के दौरान दसलक्षण महोत्सव के तहत मुनिराजों के प्रवचनों और नित पूजन, अभिषेक, शांतिधारा, भक्ति, आराधना का दौर जारी है। वैभव बडामलहारा ने बताया की विरागोदय तीर्थ में पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी ने धर्मसभा में कहा कि -वही तप जिनशासन में श्लाघनीय है, जो आत्म-कल्याण के लिए हो।

तप वहीं श्रेष्ठ है, जो कर्म-क्षय के लिए तपा जाए। आत्म भावना पूर्वक विविध प्रकार के काम-क्लेश समता पूर्वक सहन करना तप है। विषय-कषायों का निग्रह करते (हुए, ध्यान- अध्ययन के साथ, आत्म-भावनापूर्वक साधना करना ही तप है। तप से कर्म-निर्जरा होती है। इच्छाओं का शमन, आकांक्षाओं का अभाव ही तप है।

ज्ञान आत्म-बोधक है, तप आत्म शोधक है। अनशन, अवमोदर्य, वृत्ति परिसंख्यान, रस परित्याग, विविक्त शैयाशन, काय-क्लेश ये बाह्य तप हैं और प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य स्वाध्याय, व्युत्सर्ग, ध्यान ये अंतरंग तप हैं। सम्यग्दृष्टि वीतरागी-साधुओं के समीचीन-तप से कर्मक्षय होता है तथा शाश्वत-शांति का पथ प्रशस्त होता है। उन्होंने कहा कि उमंग, उत्साह पूर्वक तप करना चाहिए।

आत्मा तप के प्रभाव से कर्म-कलंक से भिन्न होती है

स्वस्थ अवस्था में किया गया तप शीघ्र ही श्सिद्धिश् प्रदान करता है। शरीर स्वस्थ है, इन्द्रियाँ स्वस्थ हैं, तब तक साधना कर लो, नहीं तो अस्वस्थ अवस्था में स्वयं ही नहीं संभलोगे तो साधना कैसे करोगे? कलिकाल में सर्व श्रेष्ठ कोई तप है, तो वह श्स्वाध्यायश् है। स्वर्ण अग्नि में तपाने पर उसकी किट्टिमा भिन्न हो जाती है, स्वर्ण चमकने लगता है, इसी प्रकार आत्मा तप के प्रभाव से कर्म-कलंक से भिन्न होकर शुद्ध हो जाती है।

आत्म रुचि करो, समीचीन तप करो

डरो मत, उराओ मत । तप स्वीकार करो, कर्म कलंक हरो। तप सिद्धि का साधन है। तप से प्रशंसा और प्रसिद्धि मिलती है। तप में निराकुलता है और निराकुलता ही आनंद है। शुद्धि चाहिए, तो विशुद्धि बढ़ाओ। विशुद्धि से ही आत्म-शुद्धि संभव है। शोध चाहिए तो बोध करो, बोध के बिना शोध नहीं। बोध, बोधी से ही शोध और समाधि संभव है। तपोगे, तभी दमकोगे। चमकना है तो तपना सीखो। तप करो, कर्म हरो, सिद्धालय के कंत बनो। जितना तपोगे, उतना चमकोगे। आत्म रुचि करो, समीचीन तप करो।

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