सहारनपुर में दशलक्षण पर्व के अंतर्गत आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने कहा कि संग्रहवृति दुःख का कारण है और त्याग धर्म ही जीवन को सुखी बनाता है। निस्वार्थ दान और आसक्ति का त्याग ही आत्मा को शुद्ध करता है। पढ़िए सोनल जैन की ख़ास रिपोर्ट…
सहारनपुर। दशलक्षण महापर्व के अवसर पर सहारनपुर स्थित “उपासक धर्म संस्कार शिविर” में भावलिंगी संत दिगंबर जैनाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ससंघ (30 पीछी) के सानिध्य में उत्तम त्याग धर्म का महत्व बताया गया। उन्होंने कहा कि संग्रहवृति ही दुःख का कारण है, जबकि त्याग धर्म आत्मा को सुखी बनाता है। राग-द्वेष और कषायिक भावों का अभाव ही वास्तविक त्याग है। चार प्रकार के दान भी त्याग धर्म के अंतर्गत आते हैं। साधना का सच्चा आनंद राग में नहीं बल्कि त्याग में ही है।
सब कुछ छूटने से पहले स्वयं त्याग कर दो
आचार्य श्री ने कहा कि पदार्थ हमें क्षणिक सुख की भ्रांति तो दे सकते हैं, लेकिन स्थायी शांति और त्रैकालिक सुख नहीं दे सकते। व्यक्ति जीवन भर परपदार्थ में सुख खोजता रहता है, लेकिन अंततः यह केवल भ्रम साबित होता है। उन्होंने कहा – “सब कुछ छूटने से पहले स्वयं त्याग कर दो, वरना समय स्वयं सब कुछ छुड़ा देगा।” त्याग धर्म आत्मा को जागृत करता है और व्यक्ति को इच्छाओं के त्याग के लिए प्रेरित करता है। उन्होंने मृत्युभोज और मृत्युदान को निरर्थक बताया और कहा कि यह neither देने योग्य है और न लेने योग्य। इस मौके पर बड़ी संख्या में जैन अनुयायियों ने भाग लिया और भावशुद्धि के द्वारा अपने जीवन को सार्थक बनाने का संकल्प लिया।













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