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मन वचन और काय की पवित्रता से शुचिता आती है : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया सत्य धर्म का रहस्य 


विधानाचार्य कीर्तिय के निर्देशन में पंचामृत अभिषेक के बाद इंद्र ध्वज मंडल विधान की पूजन प्रतिदिन चल रही है। आचार्य श्री द्वारा पूजन के मध्य पूजन के द्रव्यों को चढ़ाने से होने वाले पुण्य के बारे में बताया जाता है। दोपहर को तत्वार्थ सूत्र की विवेचना आचार्य श्री द्वारा की जाती है। टोंक से पढ़िए, यह खबर…


टोंक। दशलक्षण पर्व के 5 वंे दिन उत्तम सत्य धर्म पर आचार्यश्री के प्रवचन हुए। इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमानसागर जी कहा कि पर्व धार्मिक पाठशाला है। जिसमें आप इन अनादि काल के अलौकिक पर्वों से आत्मानुशासन सीख सकते हैं। वाणी में सत्यता को लाकर कषायो को मंद करना चाहिए। कषाय से शरीर आत्मा की हानि होती है। इनसे कभी लाभ नहीं होता। इसीलिए मान को जहर की संज्ञा दी गई है। प्राचीन अकलंक देव स्वामी अमृत चंद देव ने लोभ के अनेक प्रकार में जीवन का, आरोग्यता का, इंद्रिय विषयों का, यश का,राज्य का, धन का, रूप रस आदि अनेक लोभ की विवेचना की। राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने अपने प्रवचन में कहा कि जीवन रक्षा और रसना लोलुपता के लोभ में सुभौम चक्रवती ने जीवन रक्षा के लिए णमोकार मंत्र को लात मारी। बीमारी में आप भक्ष्य और अभक्ष्य दवाइयों का ध्यान नहीं रखते।

यश और राज्य के लोभ में भरत और बाहुबली की कथा सब जानते है। चक्रवती भी पर्वत पर किसी का नाम मिटा कर स्वयं का लिखता है। रूप और रस शब्द भोजन के लोभ में पतंगे हिरण, मछली और भंवरा के प्राण चले जाते हैं। राज्य लोभ में कौरवों और पांडवों के युद्ध को सब जानते है। धन के लोभी सेठ जो स्वर्ण और जवाहरात के बैल की जोड़ी के लिए वर्षा में प्राणों को संकट में डालता है।

श्रीजी मंडल विधान और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं

अनेक उदाहरणों से बताया कि लोभ का संवरण कर संतोष ही शौच धर्म है। आत्मा में विकृति अपवित्रता लोभ से आती है। मन वचन और काय की पवित्रता से शुचिता उत्पन्न होती हैं। आकांक्षा और इच्छा सीमित करने से लोभ कम होता हैं। मुनि श्री चिन्मय सागर जी के एकांतर उपवास की साधना जारी है। पवन और विकास के अनुसार संघ सानिध्य में विधानाचार्य कीर्तिय के निर्देशन में पंचामृत अभिषेक के बाद इंद्र ध्वज मंडल विधान की पूजन प्रतिदिन चल रही है। आचार्य श्री द्वारा पूजन के मध्य पूजन के द्रव्यों को चढ़ाने से होने वाले पुण्य के बारे में बताया जाता है। दोपहर को तत्वार्थ सूत्र की विवेचना आचार्य श्री द्वारा की जाती है। शाम को श्रीजी मंडल विधान और आचार्य श्री की आरती के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।

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