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लोभ-लालच और लिप्सा से निवृत्ति ही शौच धर्म है : उत्तम शौच धर्म पर मुनिश्री प्रमाणसागर के विचारों से मिली श्रावकों को प्रेरणा 


दशलक्षण पर्व के चतुर्थ दिवस पर उत्तम शौचष्धर्म की व्याख्या करते हुए मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा- मन की तरंग मार ले, बस हो गया भजन; आदत बुरी सुधार ले, बस हो गया भजन। मुनिश्री ने कहा कि इंसान झोपड़ी में रहता है लेकिन, महलों की चाह उसे चैन से जीने नहीं देती। भोपाल से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…


भोपाल। दशलक्षण पर्व के चतुर्थ दिवस पर उत्तम शौचष्धर्म की व्याख्या करते हुए मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा- मन की तरंग मार ले, बस हो गया भजन; आदत बुरी सुधार ले, बस हो गया भजन। मुनिश्री ने कहा कि इंसान झोपड़ी में रहता है लेकिन, महलों की चाह उसे चैन से जीने नहीं देती। यही चाह जीवन में काँटों का मार्ग बनाती है। धन की चाह कांटों का ताज है, जिसने गरीब से लेकर करोड़पति तक सभी को दौड़ाया है। धन की यह दौड़ इंसान को ठहरने नहीं देती और चित्त को मलिन करती है। उन्होंने कहा कि लोभ-लालच और लिप्सा से निवृत्ति ही शौच धर्म है। इच्छाओं की आग कभी खत्म नहीं होती, वह हवा और ऑक्सीजन की तरह भड़कती रहती है किंतु, संयम रूपी नाइट्रोजन ही इस आग को शांत कर सकती है।

दूसरों की ओर निगाह रखने से केवल ‘दाह’ बढ़ती है

मुनिश्री ने प्रसिद्ध लेखक टॉलस्टॉय का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन की दो बड़ी घटनाएँ हैं- जिसे वह चाहता है, वह मिलता नहीं और जो मिलता है, उसे चाहता नहीं। यदि जीवन को संभालना है तो जो मिला है उसमें संतोष करना सीखना होगा। दूसरों की ओर निगाह रखने से केवल ‘दाह’ बढ़ती है। उन्होंने स्पष्ट कहा- चाह होगी तो दाह होगी। इसे कोई रोक नहीं सकता। बड़े-बड़े धनपति और उद्योगपति भी इस संसार से आह भरते ही विदा हो गए। यदि चाह और दाह को शांत करना है तो संयम की राह पकड़ो, जहाँ संतोष ही आदर्श है।

दशलक्षण धर्म की पूजा भक्ति भाव से की 

जैन धर्म निष्कर्म बनने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि निष्काम बनने की राह दिखाता है। जीवन में पुरुषार्थ करना चाहिए, किंतु यह भाव रखना आवश्यक है कि ष्मेरे हाथ में प्रयत्न है, परिणाम नहीं। प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि प्रातःकाल भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा के साथ दशलक्षण धर्म की पूजा भक्ति भाव से की गई। भगवान पुष्पदंत स्वामी के निर्वाण कल्याणक के अवसर पर मुनिश्री ने भावनायोग के माध्यम से श्री सम्मेदशिखर तीर्थराज का ध्यान कराया और निर्वाण लाड़ू चढ़ाया गया। इसका सौभाग्य मधु जैन व पारस जैन (आगरा) को प्राप्त हुआ। इस अवसर पर भोपाल सहित इंदौर, विदिशा, सागर, ललितपुर, मुंबई, आगरा, दिल्ली, कोलकाता और बोस्टन (अमेरिका) से श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। मुनिश्री संधानसागर महाराज सहित सभी क्षुल्लक विराजमान रहे। संचालन अशोक भैया लिधोरा ने किया।

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