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लोभ की मुक्ति से मिलती है पवित्रता : मुनि गुरुदत्त सागर ने बताया उत्तम शौच धर्म का महत्व 


श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन रविवार को उत्तम शौच धर्म पर धर्मसभा का आयोजन हुआ। आचार्य श्री निर्भयसागर महाराज के शिष्य मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी एवं मुनि श्री मेघदत्त सागर जी की ससंघ मंगलमय उपस्थिति में श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ लिया। महरौनी से पढ़िए, यह खबर…


महरौनी। श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन रविवार को उत्तम शौच धर्म पर धर्मसभा का आयोजन हुआ। आचार्य श्री निर्भयसागर महाराज के शिष्य मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी एवं मुनि श्री मेघदत्त सागर जी की ससंघ मंगलमय उपस्थिति में श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ लिया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री गुरुदत्त सागर जी ने कहा कि “उत्तम शौच का दूसरा नाम शुचिता और पवित्रता है। यह लोभ और अत्यधिक इच्छाओं को नियंत्रित करने से प्राप्त होती है। व्यक्ति को अपने पास जो है, उसी में संतोष करना चाहिए। लोभ के वशीभूत होकर ही मनुष्य सभी प्रकार के पाप कर्म करता है और यही समस्त दुखों का मूल कारण है।

इसी कारण लोभ को ‘पाप का बाप’ कहा गया है। अतः हमें लोभ का त्याग कर आत्मा को शुद्ध एवं पवित्र बनाने का प्रयास करना चाहिए।” वहीं मुनि श्री मेघदत्त सागर जी ने प्रवचन में कहा कि उत्तम शौच धर्म का अर्थ है आत्मा में शुचिता, लोभ का अभाव और संतोष का भाव। उन्होंने कहा कि बाहरी वस्तुओं की लालसा छोड़कर, जो कुछ है उसमें संतुष्ट रहने से ही वास्तविक पवित्रता प्राप्त होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि “केवल बाहरी स्नान करने से शरीर शुद्ध नहीं होता, बल्कि आत्मा की शुद्धि के लिए लोभ कषाय का अभाव आवश्यक है।” रात्रि में पुरुष एवं महिला वर्ग की ओर से धार्मिक अंताक्षरी प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने बड़ी रुचि ली। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहीं और दशलक्षण महापर्व की बेला को धर्ममय वातावरण में मनाया। पंडित सनिल के भजनों ने इस पर्व में समां बांध दिया।

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