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संतोषी प्राणी सदैव पुण्य का बंध करता है : उत्तम शौच धर्म पर प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन ने दी शिक्षा

अयोध्या। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद के कार्याध्यक्ष अशोक पाटील ने बताया कि गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या में विराजमान हैं। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के संघस्थ ब्रम्हचारी प्रतिष्ठाचार्य विजयकुमार जैन ने उत्तम धर्म के बारे में कहा कि – उत्तम शौच सर्व जग जाना, लोभ पाप को बाप बखाना। आशा-पास महा दुःखदानी, सुख पावैं संतोषी प्रानी।। उत्तम शौच धर्म सुचिता के भाव को प्रगट करता है। शौच अर्थात् आत्म शुद्धि।

जब तक आत्मा में शुद्धि के परिणाम नहीं होगे अर्थात् परिणामों में विशुद्धि नहीं होगी तब तक किसी भी प्रकार का धर्म प्रगट नहीं हो सकता है। शौच धर्म लोभ-कषाय के अभाव में प्रगट होता है। आचार्यों ने लोभ को पाप का बाप कहा है क्योंकि, प्राणी लोभ के वशीभूत होकर के ही पापों को करता चला जाता है एवं अपने आपको दुर्गति का पात्र बना लेता है। आशाओं से परिपूर्ण व्यक्ति सदैव ही लोभवृत्ति को प्राप्त होता है। संतोषी प्राणी सदैव पुण्य का बंध करता है एवं पापों से दूर रहता है। यही उत्तम शौच धर्म है। शुचि का जो भाव शौच वो ही, मन से सब लोभ दूर करना। निर्लोभ भावना से नित ही, सब जग को स्वप्न सदृश गिनना।

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