आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज ने कहा कि दसलक्षण महापर्व केवल जैनों का पर्व नहीं है बल्कि यह सम्पूर्ण मानव समाज के लिए जीवनोपयोगी है। धर्म के दस लक्षण ही विश्व शान्ति की आधारशिला हैं। पढ़िए सोनल जैन की ख़ास रिपोर्ट…
दिगम्बर जैन धर्म में भाद्रपद शुक्ला पंचमी से प्रारम्भ होने वाला दसलक्षण महापर्व वास्तव में विश्व शान्ति का पर्व माना गया है। श्रमणाचार्य विमर्श सागर जी महामुनिराज ने अपने उपदेश में कहा कि धर्म के दस लक्षण ही वास्तविक शान्ति का आधार हैं। उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य जीवन की दिशा को बदल सकते हैं। उन्होंने समझाया कि क्षमा हर समस्या का समाधान है, मार्दव जीवन में मृदुता लाता है, आर्जव छल-कपट से बचाता है, शौच संतोष का भाव जगाता है, सत्य धर्म हितकारी वचनों की शिक्षा देता है। संयम मनोबल बढ़ाता है, तप आत्मा को शुद्ध करता है, त्याग निस्वार्थ सेवा की भावना देता है, आकिंचन्य ‘मैं’ और ‘मेरेपन’ का विसर्जन कर आत्मा से जुड़ने का मार्ग दिखाता है, और ब्रह्मचर्य सामाजिक मर्यादा और स्थिरता का आधार बनता है।
आचार्य श्री ने कहा कि इन दस दिनों में साधर्मियों को खान-पान, आचरण और व्यवहार सुधारकर संयमित जीवन अपनाना चाहिए। सामायिक, उपवास, स्वाध्याय और साधना के माध्यम से धर्ममय जीवन जिया जा सकता है। व्यापार, गपशप और भोगवादी प्रवृत्तियों का त्याग कर सात्विक और सादगीपूर्ण जीवन से ही आत्मा की शुद्धि संभव है।













Add Comment