हमारे वीतरागी संत केवल अपना ही नहीं, बल्कि समस्त जीव जगत का कल्याण करते हैं। समाज और राष्ट्र को उनका योगदान अतुलनीय है। बीसवीं शताब्दी में इस परंपरा के पुनर्जागरण के सूत्रधार, चारित्र चक्रवर्ती 108 आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज हुए, जिन्होंने दिगंबर मुनि परंपरा को पुनर्जीवित किया। पढ़िए उनके समाधि दिवस पर उदयभान जैन का विशेष आलेख…
सच्चे देव-शास्त्र-गुरु ही जैन संस्कृति के मूल बिंदु हैं। भारत की यह पुण्यभूमि त्याग, तप, साधना और चारित्र प्रधान परंपरा के लिए जानी जाती है। यही वह भूमि है जहाँ अयोध्या जैसे शाश्वत तीर्थ और झारखंड का सम्मेद शिखर जी अवस्थित हैं। यही से तीर्थंकरों ने जन्म और मोक्ष प्राप्त कर सिद्ध शिला पर विराजमान होकर जगत का कल्याण किया। आचार्य भगवंतों ने स्पष्ट कहा है कि मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य संयम पथ पर चलकर आत्मकल्याण और अंततः सिद्ध शिला तक पहुँचना है। हमारे वीतरागी संत केवल अपना ही नहीं, बल्कि समस्त जीव जगत का कल्याण करते हैं। समाज और राष्ट्र को उनका योगदान अतुलनीय है। बीसवीं शताब्दी में इस परंपरा के पुनर्जागरण के सूत्रधार, चारित्र चक्रवर्ती 108 आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज हुए, जिन्होंने दिगंबर मुनि परंपरा को पुनर्जीवित किया।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
आचार्य श्री का जन्म कर्नाटक राज्य के बेलगाम जिले की चिकोडी तहसील के बेलगुल ग्राम में 25 जुलाई 1872 (आषाढ़ कृष्ण षष्ठी, विक्रम संवत् 1929) को भीमगोड़ा पाटिल और धर्मपत्नी सत्यवतीजी के यहाँ हुआ। बालक का नाम रखा गया गौड़ा। क्षत्रिय वंश में जन्मे इस पुण्यात्मा की मातृभाषा मराठी थी। तीन भाई-बहनों में यह प्रतिभाशाली बालक लौकिक शिक्षा में केवल तीसरी कक्षा तक ही पढ़ पाया, किंतु माता-पिता के धार्मिक संस्कारों ने उनके जीवन की धारा तय कर दी। नौ वर्ष की अल्पायु में विवाह हुआ, किंतु संयोगवश छः माह पश्चात् पत्नी का स्वर्गवास हो गया। इसके बाद उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। 15 वर्ष की उम्र में ब्रह्मचर्य व्रत लिया और 32 वर्ष की आयु में घी-तेल का त्याग कर एक समयाहार का नियम अपना लिया। दयामयी और करुणामयी प्रवृत्ति से युक्त, वे खेती-बाड़ी और व्यापार में भी जीवों के प्रति संवेदनशील रहे। खेत में पक्षियों-पशुओं को कभी नहीं भगाया और कपड़े के व्यापार में ग्राहकों को पूर्ण स्वतंत्रता दी।
दीक्षा और आचार्य पद
43 वर्ष की आयु में क्षुल्लक दीक्षा और 1920 में आचार्य देवेंद्र कीर्ति से मुनिदीक्षा प्राप्त की। 1924 में ममडोली ग्राम में आचार्य पद से अलंकृत किए गए और वहीं चतुर्विध संघ की स्थापना हुई। उनके नेतृत्व में श्रमण संस्कृति को पुनः जीवंत स्वरूप मिला। समाज को पड़गाहन विधि का ज्ञान, 1930 में करुणाभाव से संघ की रक्षा, और 1931 में दिगंबर मुनियों को स्वतंत्र विचरण की अनुमति—ये सब उनके योगदान रहे। 1937 में गजपंथा जी पर उन्हें चारित्र चक्रवर्ती की उपाधि से विभूषित किया गया।
उपसर्ग विजेता
आचार्य श्री तप और संयम के पर्याय बने। कौन्स गुफा में ध्यान के समय सर्प दो घंटे तक लिपटा रहा, द्रोणगिरि पर शेर उनके पास बैठा रहा, लेकिन वे अविचल सामायिक में लीन रहे। ऐसे अनेक उपसर्गों पर विजय पाकर वे उपसर्ग विजेता कहलाए।
समाधिमरण
आचार्य श्री ने 36 वर्ष का दीक्षित जीवन व्यतीत किया, जिसमें लगभग 25 वर्ष उपवास में रहे। अंततः कुंथलगिरि में संलेखना पूर्वक 28 अगस्त 1955 (भाद्र शुक्ला द्वितीया) को प्रातः 6:50 बजे “ॐ सिद्धाय नमः” का उच्चारण करते हुए समाधिमरण प्राप्त किया। उनके जीवन ने आने वाली पीढ़ियों को समाधि-मरण का अद्भुत उदाहरण दिया।
अमिट योगदान
आज लगभग 1800 से अधिक दिगंबर साधु चारित्र पथ पर अग्रसर हैं, यह आचार्य श्री की ही कृपा का परिणाम है। उनके शिष्य और परंपरा में आचार्य वीरसागर जी, शिवसागर जी, धर्मसागर जी, श्रेयांससागर जी, अभिनंदनसागर जी और वर्तमान में आचार्य वर्धमान सागर जी तथा अनेकान्तसागर जी आचार्य परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने उनके नाम से सम्मेद शिखरजी पर शान्तिसागर धाम का निर्माण कराया, जहाँ 31 फीट ऊँची भगवान अजितनाथ की प्रतिमा विराजमान है। माताजी के आशीर्वाद और प्रेरणा से समाधि दिवस पर देशभर में संगोष्ठियाँ, प्रदर्शनी, नाटिकाएँ, भाषण और प्रतियोगिताएँ आयोजित होती हैं। आज भी आचार्य श्री का समाधि दिवस पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।













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