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बाड़मेर में पहली बार संथारा उत्सव आयोजित : वकील मीठालाल चोपड़ा ने लिया समाधि मरण, बैकुंठी यात्रा निकाली, हजारों श्रद्धालुओं ने लिया हिस्सा


बाड़मेर में जैन धर्म की महान परंपरा संथारा का आयोजन पहली बार हुआ। 84 वर्षीय वकील मीठालाल चोपड़ा ने चार दिन का संथारा ग्रहण कर शुक्रवार को समाधि मरण को पूर्ण किया। हजारों श्रद्धालुओं ने भजन-कीर्तन और बैकुंठ यात्रा में भाग लिया। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…


बाड़मेर। जैन धर्म की महान परंपरा संथारा (देह त्याग) का अद्भुत दृश्य बाड़मेर में पहली बार देखने को मिला। तेरापंथ संप्रदाय से जुड़े 84 वर्षीय वकील मीठालाल चोपड़ा ने संथारा ग्रहण किया, जो शुक्रवार शाम को पूर्ण हुआ। शनिवार को हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में ढोल-नगाड़ों, बैंड-बाजे और णमोकार मंत्र के जाप के बीच उनकी बैकुंठी यात्रा निकाली गई।

चार दिन पूर्व छोड़ा था अन्न-जल

मीठालाल चोपड़ा ने 18 अगस्त की सुबह 11 बजे अपनी इच्छा से चार प्रकार के आहारों का त्याग कर दिया था। इसे जैन धर्म में समाधि मरण या संथारा कहा जाता है। उनके भतीजे जितेंद्र चोपड़ा ने बताया कि यह निर्णय आचार्य श्री महाश्रमण की आज्ञा से लिया गया। 20 अगस्त को विधिवत संकल्प कराया गया और चार दिन का संथारा शुक्रवार को सम्पन्न हुआ।

उत्सव का वातावरण

संथारा के बाद चोपड़ा के निवास पर रातभर भजन-कीर्तन और णमोकार मंत्र का जाप हुआ। सुबह बैंड-बाजों के साथ बैकुंठ यात्रा निकाली गई, जिसमें हजारों लोग उमड़े। लोग शोक में नहीं बल्कि भक्ति भाव से शामिल हुए। समाजजनों का मानना है कि संथारापूर्वक देह त्यागने वाला उत्तम गति को प्राप्त करता है, इसलिए इसे उत्सव की तरह मनाया जाता है।

बाड़मेर के इतिहास में पहली बार

मुनि यशवंत ने बताया कि बाड़मेर में यह पहला अवसर है जब किसी श्रावक ने संथारा लिया। इससे पहले यहां न तो किसी साधु-साध्वी का और न ही किसी श्रावक-श्राविका का संथारा हुआ था। उन्होंने कहा कि यह बाड़मेर के धार्मिक इतिहास में नया अध्याय जुडऩे जैसा है।

अंतिम संस्कार की विशेष परंपरा

संथारा के बाद मृत्यु होने पर शव को नहलाया नहीं जाता, बल्कि गुलाब जल से पोंछकर सफेद वस्त्र पहनाए जाते हैं। अर्थी पर समाधि की अवस्था में बैठाकर बांधा जाता है। सिर पर वस्त्रिका (सफेद मास्क) पर केसर से स्वास्तिक बनाया जाता है और हाथ में चांदी की माला दी जाती है। अर्थी में सूखे गुलाब की पंखुडिय़ां, चंदन-अगरबत्ती और पांच चांदी के कलश रखे जाते हैं। अंतिम संस्कार चंदन की लकडिय़ों और घी से किया जाता है, जिसमें कपूर और केसर भी डाला जाता है। संथारा ग्रहण करने वालों के लिए दाह संस्कार की जगह सामान्य श्मशान भूमि से अलग रखी जाती है।

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