यह नगर का परम सौभाग्य है कि आचार्यश्री विनिश्चय सागर जी ससंघ यहां वर्षावास कर चातुर्मास कर रहे हैं। इस दौरान उनकी मंगल देशना से सकल दिगंबर जैन समाज धर्मलाभ ले रहा है। बड़ी संख्या में समाजजन उनके प्रवचनों का धर्मानंद ले रहे हैं। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…
रामगंजमंडी। यह नगर का परम सौभाग्य है कि आचार्यश्री विनिश्चय सागर जी ससंघ यहां वर्षावास कर चातुर्मास कर रहे हैं। इस दौरान उनकी मंगल देशना से सकल दिगंबर जैन समाज धर्मलाभ ले रहा है। बड़ी संख्या में समाजजन उनके प्रवचनों का धर्मानंद ले रहे हैं। मंगलवार को धर्मसभा में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने स्थितिकरण अंग पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा मार्ग पाने के लिए मार्ग की व्यवस्था करनी पड़़ती है। मार्ग बनाना पड़ता है। जब मार्ग बनाने बैठते हैं तो बहुत सारे दृष्टिकोण रखने पड़़ते हैं। एक दृष्टिकोण से मार्ग नहीं बैठ सकता और बनाते-बनाते सभी पहलुओं को लागू करते हैं तब जाकर मार्ग बनता है।
जहां आत्मा को अध्यात्म आनंद आता है
आचार्यश्री ने प्रवचन में कहा कि व्यक्ति भौतिकवाद में इतना लग जाता है कि वो धर्म को बहुत पीछे छोड़ देता है। उन्होंने कहा विज्ञान भी पुदगल को संभालता है। बिगड़े को हुए पुदगल को संभालना विज्ञान का काम है। एक ऐसा विज्ञान भी है जो शरीर को नहीं संभालता धर्म को संभालता है, आत्मा को संभालता है। एक ऐसा विज्ञान है आत्मा को दिलाने वाला है, जहां आत्मा को अध्यात्म आनंद आता है। वह धर्म विज्ञान है, जब हमारे अंदर उतरता है तो उससे हमारी बुद्धि निखरती है, हमारे सोचने की शक्ति है वह बढ़ जाती है और सही दृष्टिकोण पर पहुंच जाती है।
बुद्धि का प्रयोग बड़ी मुश्किल से हो पाता है
बुद्धि बहुत छोटी सी चीज है जिसका काम है ज्ञान को प्रस्तुत करना ज्ञान जीव का विशेष गुण होता है। उन्होंने कहा कि ज्ञान का अकेला प्रयोग है और बुद्धि का प्रयोग नहीं है तो काम ठीक से नहीं होगा। उदाहरण के माध्यम से बताया कि 5 साल का बच्चा ज्ञान का प्रयोग तो करता है लेकिन, बुद्धि का प्रयोग नहीं करता है। अनपढ़ व्यक्ति ज्ञान का प्रयोग ज्यादा करता है बुद्धि का प्रयोग कम करता है। समझदार व्यक्ति यह प्रयास करता है ज्ञान का प्रयोग कम हो और बुद्धि का प्रयोग ज्यादा हो। हमें भी ज्ञान का प्रयोग कम बुद्धि का प्रयोग ज्यादा करना चाहिए।
ऐसी जगह खड़े करना है, जहां से गिरने की संभावना न हो
उन्होंने एक उदाहरण के माध्यम से बताया कि एक पिता ने अपने बेटे से कहा कि घोड़े को पानी दिखा कर लाओ तो बेटे ने ज्ञान का प्रयोग किया। घोड़े को तालाब के पास ले गया और घोड़े को पेड़ से बांध दिया। बेचारा घोड़ा पानी देखता रहा। घर पर लौटा पिता ने कहा पानी पिला दिया बेटे ने जवाब दिया कि आपने कहा था पानी दिखाना पानी पिलाने को नहीं कहा। उस समय ज्ञान का प्रयोग हुआ, बुद्धि का प्रयोग नहीं हुआ। बेटा अगर बुद्धि का प्रयोग करता तो यह समझता घोड़े को पानी नहीं दिखाया जाता पिलाया जाता है। बुद्धि का प्रयोग बड़ी मुश्किल से हो पाता है। बहुत पुण्य चाहिए बुद्धि का प्रयोग गिरते को उठाने के लिए करना लेकिन ऐसी जगह खड़ा नहीं करना की वह पुनः गिर जाए ऐसी जगह खड़े करना है जहां से गिरने की संभावना समाप्त हो जाए।
राग अगर अंदर दधक जाता है तो सारी अच्छाई समाप्त हो जाती है
आचार्य श्री ने राग के विषय में प्रकाश डालते हुए कहा कि राग यदि अंदर दधक जाता है तो सारी अच्छाई समाप्त हो जाती है और दृष्टिकोण में वह राग ही बैठ जाता है। राग की महिमा बड़ी अलग है। अगर गंदगी पर हो जाए तो गंदगी भी अच्छी लगती है। राग यह विचार ही नहीं कर पाता। यह हमारे लिए योग्य है या अयोग्य है। गुरु के कर्तव्य के विषय में कहा कि गुरु का कर्तव्य है की शिष्य को तब तक संभाले तब तक संभाले जब तक गुरु का अहित न हो।
जो तारीफ के योग्य है उसकी तारीफ होगी
गुरु बड़ी टेढ़ी खीर होते हैं तारीफ करते करते डांटने लग जाते हैं। जो तारीफ के योग्य है उसकी तारीफ होगी और जो डांटने योग्य है डांट तो पड़ेगी। ऐसा नहीं हो सकता कि गलती में भी तारीफ करते जाए और अच्छाई में भी तारीफ करते जाए ऐसा नहीं हो सकता। वह समझाते हैं स्थितिकरण करते हैं कि वह धर्म में स्थापित हो। किसी के हृदय में परिवर्तन करा देना यह बहुत बड़ी बात होती है। आपने विचार, भावों और क्रियाओं में परिवर्तन करा दिया है तो आपने बहुत बड़ा काम किया है।













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