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रक्षाबंधन केवल पर्व नहीं बल्कि एक मानवीय दृष्टिकोण भी : वृक्षों को महिलाओं द्वारा बांधे जा रहे रक्षा सूत्र , प्रकृति की रक्षार्थ निहित है मानव कल्याण


आज 9 अगस्त को रक्षा पर्व समूचे देश में मनाया जा रहा है। इस पर्व के पीछे समर्पण, प्रेम, प्रतिबद्धता, विश्वास की मजबूत डोर ने हमारी संस्कृति, सभ्यता और सामाजिक ताने-बाने को बहुत खूबसूरत बुना है। आइए आज इस पर्व विशेष पर पढ़िए, प्रियंका पवन धुवारा का यह आलेख…


आज के समय में रक्षाबंधन केवल भाई-बहन का पर्व नहीं रहा, यह प्रकृति की रक्षा, सामाजिक सौहार्द और समानता का प्रतीक भी बन चुका है। ‘वृक्ष-रक्षा बंधन’। बच्चे और महिलाएं पेड़ों को राखी बाँधकर यह संदेश दे रही हैं कि हम केवल मानव की नहीं, प्रकृति की भी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। रक्षाबंधन के बदलते मायने हमें यह समझाते हैं कि त्योहार केवल रस्में नहीं होते, वे विचार होते हैं, भावना होते हैं। आज का रक्षाबंधन हमें यह सीख देता है कि रक्षा एकतरफा नहीं, परस्पर होती है। रिश्ते खून से नहीं, भावना से बनते हैं। प्रकृति, समाज और देश भी हमारी रक्षा के हकदार हैं और यह कि महिला केवल संरक्षित नहीं, संरक्षक भी हो सकती है। रक्षाबंधन अब केवल एक पर्व नहीं, एक मानवीय दृष्टिकोण है— ‘जो कहता है कि प्रेम, समर्पण और समानता से ही समाज और रिश्ते टिक सकते हैं।’

रक्षा पर्व की जड़ें बहुत गहरी हैं

रक्षाबंधन की जड़ें भारतीय इतिहास, पौराणिक कथाओं और सामाजिक परंपराओं में गहराई से जुड़ी हैं। द्रौपदी और श्रीकृष्ण की कथा हो या रानी कर्णावती द्वारा हुमायूं को भेजी गई राखी। यह पर्व सदा से रक्षक और संरक्षित के बीच एक नैतिक संकल्प का प्रतीक रहा है। पहले के समय में राखी केवल भाई-बहन के खून के रिश्ते तक सीमित थी। बहन भाई की कलाई पर राखी बाँधती थी और भाई जीवन भर उसकी रक्षा करने का वचन देता था। यह रिश्ता स्नेह, विश्वास और समर्पण से भरा होता था। भारत विविधताओं से भरा देश है, जहां हर त्योहार न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक होता है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्तों को भी मजबूत करता है। इन्हीं में से यह एक विशेष पर्व है।

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