मुनि श्री सारस्वत सागरजी महाराज ने प्रवचन में कहा कि हर एक व्यक्ति सुख की कामना को लेकर नाना प्रकार के काम कर रहा है,परंतु जो कर्म वह करता है, वह कर्म भी कभी उसको दुःख देने लगते हैं।नांद्रे से पढ़िए, यह खबर…
नांद्रे। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील, कोल्हापुर ने कहा कि पट्टाचार्य विशुद्धसागर महाराज जी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज,मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्रुतसागर जी महाराज का कहतुर्मास भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में जारी है।
मुनि श्री सारस्वत सागरजी महाराज ने प्रवचन में कहा कि हर एक व्यक्ति सुख की कामना को लेकर नाना प्रकार के काम कर रहा है,परंतु जो कर्म वह करता है, वह कर्म भी कभी उसको दुःख देने लगते हैं क्योंकि, उसमें वह उदास हो जाता है। उदासी आना यह प्रीति समाप्ति का लक्षण है या प्रीति की न्यूनता का लक्षण है। यदि उदासी को आपने शीघ्र वैराग्य का रूप नहीं दिया तो वह उदासी द्वेष का रूप ले लेगी और द्वेष का परिणाम नियम से विकृत ही होता है, कष्टदायी ही होता है।













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