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आत्मा का स्वरूप बताया मुनि सिद्ध सागर जी ने : हमें मोक्ष पुरुषार्थ करते रहना चाहिए


मुनि श्री सिद्ध सागर महाराज जी ने नांद्रे में अपने प्रवचन में कहा कि एक बार एक व्यक्ति दिगंबर मुनि के पास जाकर पूछता है कि आप इतनी कठिन तपस्या क्यों करते हो? मुनि श्री जबाब देते – मोक्ष प्राप्त करने के लिए। नांद्रे से पढ़िए, यह खबर….


नांद्रे। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष श्री अभिषेक अशोक पाटील, कोल्हापुर ने कहा कि पट्टाचार्य विशुद्धसागर महाराज जी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज,मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लकश्री श्रुतसागर महाराज भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। मुनि श्री सिद्ध सागर महाराज जी ने नांद्रे में अपने प्रवचन में कहा कि एक बार एक व्यक्ति दिगंबर मुनि के पास जाकर पूछता है कि आप इतनी कठिन तपस्या क्यों करते हो? मुनि श्री जबाब देते – मोक्ष प्राप्त करने के लिए। वो पुनः पूछता है मोक्ष प्राप्त करके क्या मिलेगा। क्या वहाँ रहने के लिए महल, खाने के लिए अच्छा भोजन, घुमने के लिए सुंदर सुंदर स्थान मिलते हैं? मुनिराज उत्तर देते हैं – बेटा! शरीर को धूप, बारिश से बचाने के लिए घर की आवश्यकता है।

भूख लगने पर भोजन की आवश्यकता है। प्यास लगने पर पानी की आवश्यकता पडती है परंतु इन सब की आवश्यकता वहीं पड़ती है, जहाँ शरीर होता है। मोक्ष में तो शरीर ही नहीं होता है। वहाँ तो अशरीरी आत्मा मात्र है। वह व्यक्ति पुनः प्रश्न करता है कि स्वामी आत्मा कैसी है? उसका स्वभाव क्या है? मुनिराज बताते हैं कि आत्मा को आत्मनुभव द्वारा जाना जाता है। जिस शरीर को प्राप्त करती उसी शरीर के बराबर हो जाती। इस आत्मा में संकोच विस्तार की शक्ति होती है।

जिसके कारण वह जब चिंटी के पर्याय में जाती तो चीटी के शरीर के बराबर हो जाती है। जब यह आत्मा हाथी के प्राप्त करती है तो हाथी के शरीर के बराबर हो जाती है। यह आत्मा अविनाशी है। इसका कभी भी नाश होनेवाला नहीं है। इसके अन्य अनंत गुण है। लोक और अलोक को जानने और देखने वाली है। संसार के जो भी सुख हैं वो सब क्षणभुंगर है परंतु, मोक्ष का सुख शाश्वत सुख है। इसलिये हमें मोक्ष पुरुषार्थ करते रहना चाहिए।

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