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मरने से पहले वसीयत जरूर बनाकर जाएं: आचार्य श्री पुलक सागर जी ने पारिवारिक संबंधों को विस्तार से समझाया 


आचार्य श्री पुलक सागर जी ने यहां के चंद्रप्रभ उद्यान में रविवार को प्रवचन सभा को संबोधित किया। उन्होंने पारिवारिक संबंधों की विस्तार से व्याख्या की। इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे। आचार्यश्री के प्रवचन को सुनकर उनका लाभ प्राप्त किया। धरियावद से पढ़िए, यह खबर…


धरियावद। इस दुनिया से जाने से पहले अपनी वसीयत जरूर लिखकर जाना चाहिए। ताकि मरने के बाद दुनिया में कोर्ट-कचहरी नहीं करना पड़े और परिवार, समाज विवादों से बचा रह सके। हमारे देश की महिलाएं पति को परमेश्वर मानती हैं। नारी अपने बच्चों के लिए पति के लिए भोजन बनाती है। अगर पति और बच्चे बाहर शहर या विदेश में रह रहे हों तो अपने लिए भोजन न के बराबर बनाकर अचार के साथ सूखी रोटी खाकर भी दिन गुजार देती है। वह स्वयं के लिए नहीं, बल्कि पति परमेश्वर के लिए जीवन जीती है। यह भारतीय नारी की पहचान है। अतः समय रहते पत्नी और बच्चों को अपने-अपने हिस्से की वसीयत जरूर लिख देनी चाहिए। ये बातें आचार्य श्री पुलक सागर जी ने यहां के चंद्रप्रभ उद्यान में रविवार को प्रवचन सभा में कहीं। आचार्य श्री ने वास्तव में माता-पिता को अपने बच्चों को धार्मिक संस्कार विरासत में देकर जाने की बात पर जोर दिया। प्रवचन सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जन्म देने वालों को जनक-जननी का दर्जा प्राप्त हो जाता है।

मगर माता-पिता का दर्जा उन्हीं को प्राप्त होता है जो अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देते हैं। संस्कार माता-पिता और गुरु ही दे सकते हैं। आप बच्चों का भविष्य बनाएंगे तो आपके बुढ़ापे का भविष्य स्वतः सुधर जाएगा। आचार्य श्री पुलक सागर जी ने कहा कि वह स्कूल अच्छा नहीं होता है, जहां पर बिल्डिंग अच्छी होती है। बल्कि स्कूल वह अच्छा होता है, जहां की शिक्षा अच्छी होती है। सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों से कम नहीं आंकना चाहिए क्योंकि, बड़े-बड़े महापुरुष, वैज्ञानिक, डॉक्टर वकील, प्रिंसिपल उच्च पदों पर आसीन अधिकारी आदि सभी सरकारी स्कूलों में ही पढ़कर बड़े बने हैं। आचार्य श्री ने बताया कि वह स्वयं भी सरकारी स्कूल से ही पढ़कर निकले और आज पूरे देश और विदेश में उन्हें सुना जाता है।

गांव की जीवनशैली श्रेष्ठ 

जैन समाज के अशोक कुमार जेतावत ने बताया कि गांव और शहरों की जीवनशैली की तुलना करते हुए आचार्य श्री पुलक सागर जी ने कहा कि गांव में परिवार का एक सदस्य कमाता है और बाकी सभी साथ बैठकर खाते हैं। वहीं, शहरों में परिवार के चार सदस्य कमाते हैं, फिर भी साथ बैठकर खाना नसीब नहीं होता है। आचार्य श्री ने कहा कि गांव के अनाथ आश्रम में गरीबों के अनाथ बच्चे रहते हैं। मगर शहरों में अमीरों के मां-बाप वृद्धाश्रम में रहा करते हैं। गांव के अनपढ़ युवा गायों को जंगल में चराने ले जाते हैं और शहर के पढ़े लिखे युवा कुत्तों को घूमाने ले जाते हैं। गांवों में गाय घरों में बंधी रहती है और कुत्ते सड़क पर घूमते हैं, जबकि शहरों में कुत्ते घरों में रहते हैं और गाय सड़कों पर घूमती रहती हैं। गांवों में घर दूर-दूर होते हैं पर मन पास रहते हैं। शहरों में मकान और फ्लैट पास-पास होते हैं, लेकिन लोग मन (दिल) से दूर रहते हैं। आचार्य श्री ने ग्रामीण जीवन शैली को शहरों की तुलना में श्रेष्ठ बताया।

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