हर साल जून महीने का तीसरा रविवार हमें एक ऐसे व्यक्ति की याद दिलाता है, जो हमारी परवरिश की नींव होता है — पिता। यह दिन केवल उपहार देने या शुभकामनाएं भेजने भर का अवसर नहीं, बल्कि उनके त्याग, अनुशासन, मेहनत और प्रेम को महसूस करने का दिन है, जो अक्सर शब्दों से परे होता है। आज इस विशेष अवसर पर पढ़ें अजीत कोठिया का विशेष आलेख
फादर्स डे पर मुझे अपने पूज्य बड़े दादाजी श्री छबीलाल जी कोठिया की प्रेरणा और सीख याद आती है। वे मेरे सेवा कार्यों से अत्यंत प्रभावित रहते थे। वे प्रायः मुझे प्रातःकाल श्वेत धोती-दुपट्टे में जिनालय जाकर भगवान पार्श्वनाथ का अभिषेक करने हेतु प्रेरित करते थे। उनकी यह सीख, उनके निधन के 15 वर्षों बाद भी, मुझे प्रतिदिन मंदिर जाकर भगवान का जलाभिषेक करने के लिए प्रेरित करती है — और यह क्रम आज भी अनवरत जारी है।
बात सन् 2008 की है। उस समय 91 वर्षीय दादाजी जीवन के अंतिम पड़ाव पर थे। हम सभी उन्हें णमोकार महामंत्र का जाप सुनाते हुए उनके पास बैठे थे। मैं उनके सिरहाने बैठा था। मैंने उनसे पूछा, “दादा, कोई अंतिम इच्छा हो तो बताइए।”
उन्होंने तत्काल मेरा हाथ अपने दोनों हाथों में थामा और बोले:
“तू महावीर इंटरनेशनल के माध्यम से कई वर्षों से पीड़ित मानवता की सेवा, रक्तदान, वृक्षारोपण और अन्य कई सेवा कार्य कर रहा है। बैंक की नौकरी की व्यस्तता के बावजूद तू सेवा के कामों को जारी रखना… छोड़ना मत। तू सही मार्ग पर है बेटा…”
यह कहकर उन्होंने अपने कृशकाय, कांपते दोनों हाथों से मुझे आशीर्वाद दिया। मैंने भी उनका हाथ थाम कर उन्हें विश्वास दिलाया कि मैं अपने सेवा कार्यों को निरंतर जारी रखूंगा।
परिजन दादाजी के कानों में लगातार णमोकार मंत्र का जाप करते रहे। जैसे ही मंत्र का अंतिम पद
“णमो लुए सव्व साहूणं”
दोहरा रहे थे, उसी क्षण दादा जी ने अंतिम सांस ली… और उनके प्राण पखेरू उड़ गए।
आज वे शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, परंतु उनकी सीख और आशीर्वाद मेरे भीतर जीवंत हैं। उनकी प्रेरणा से पीड़ित मानवता की सेवा का मेरा सफर आज भी जारी है — उसी समर्पण और श्रद्धा के साथ।













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