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मुनि पूज्यसागर जी महाराज का बेड़ियां से सनावद नगर में मंगल प्रवेश: दो संतों के मिलन से फैला ज्ञान का उजियारा


अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज का बेड़ियां से सनावद नगर में मंगलमय प्रवेश हुआ। नगरवासियों ने ढोल-नगाड़ों और पाद प्रक्षालन के साथ मुनिश्री की भव्य अगवानी की। मुनि पूज्यसागर जी के आगमन के अवसर पर नगर में विराजमान आचार्य श्री विनम्र सागर जी के संघ के अन्य मुनियों ने स्वागत हेतु स्वयं पहुंचकर नमोस्तु किया। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


सनावद। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज का बेड़ियां से सनावद नगर में मंगलमय प्रवेश हुआ। नगरवासियों ने ढोल-नगाड़ों और पाद प्रक्षालन के साथ मुनिश्री की भव्य अगवानी की। चारों ओर धार्मिक उल्लास और श्रद्धा का वातावरण छाया रहा। सनावद नगर में इन दिनों आचार्य श्री विनम्र सागर जी महाराज विगत 17 दिनों से ससंघ विराजमान हैं। मुनि पूज्यसागर जी के आगमन के अवसर पर आचार्य श्री के संघ के अन्य मुनियों ने स्वागत हेतु स्वयं पहुंचकर नमोस्तु किया और आत्मीय भाव से उनका स्वागत किया। मंगल प्रवेश के पश्चात मुनि पूज्यसागर जी महाराज प्रवचन सभा में विराजमान आचार्य श्री विनम्र सागर जी महाराज के दर्शन हेतु पहुंचे, जहां उन्होंने आचार्य श्री के चरणों का स्पर्श कर नमोस्तु किया।

इसके पश्चात, दोनों संतों ने धर्मसभा को संबोधित किया। मुनि पूज्य सागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि हम किसी न किसी रूप में 24 घंटे पाप कर्म करते हैं क्योंकि पाप 108 प्रकार के होते हैं। इन सभी पाप कर्मों के नाश के लिए हमें धैर्य की साधना-आराधना करनी चाहिए। गुरुओं के आहार-विहार और निहार में सहयोगी बनना आवश्यक है, जो व्यक्ति ऐसा कर रहा है, वह अपने आपको पुण्यशाली समझे क्योंकि साधु की संगति मुश्किल से मिलती है।

जो व्यक्ति मुनियों को आहार न देने के भाव बनाता है, वह पाप का भागी बनता है। हम सभी के मन में एक सी श्रद्धा होनी चाहिए। शिक्षा हमें अनेक रूप में मिल सकती है, लेकिन श्रद्धा सभी के प्रति एक जैसी होनी चाहिए, तभी सम्यक दर्शन होगा। श्रद्धा सच्चे मन से होनी चाहिए। वही आचार्य श्री विनम्र सागर ने कहा कि आत्मज्ञान प्राप्त होना बहुत जरूरी है। गुरुओं का सम्मान करना चाहिए। तृप्ति भाव से दान करना चाहिए क्योंकि तुम्हें जो कुछ भी मिलेगा, सब दान से ही मिलेगा।

दुनिया में सबसे बड़ी चीज दान है। तीर्थंकर के जन्म पर 14 करोड़ रत्न एक दिन में बरसे। लेकिन उससे पहले उन्हें सम्यक दर्शन प्राप्त हुआ। शिक्षा बहुतों से मिलती है, दीक्षा से एक से ही मिलती है, इसलिए दीक्षा देने वाले को आचार्य कहा गया है। जिसे जितने ज्यादा ज्ञान होता है, उतना ही बढ़िया काम होता है। एक साधु को आहार देकर हम बहुत पुण्य कमा सकते हैं।

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