जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी, जिन्हें भगवान ऋषभनाथ जी के नाम से भी पूजित और वंदित हैं। इनका गर्भ कल्याणक इस बार 13 जून को आ रहा है। इस दिन आषाढ़ कृष्ण द्वितीया है। इसी दिन भगवान का गर्भ कल्याणक दिगंबर जैन मंदिरों में पूर्ण भक्ति भाव से मनाया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल द्वारा संकलित यह प्रस्तुति…
इंदौर। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ, जिन्हें सकल विश्व में भगवान ऋषभनाथ जी के नाम से श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। इन्हीं प्रथम तीर्थंकर भगवान का गर्भ कल्याणक आषाढ़ कृष्ण द्वितीया को मनाया जाता है। इस दिन माता मरुदेवी ने भगवान आदिनाथ को अपने गर्भ में धारण किया था। जो इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर हैं। भगवान आदिनाथ के गर्भ कल्याणक की तिथि आषाढ़ कृष्ण द्वितीया है। माता का नाम मरुदेवी तथा पिता का नाम नाभिराय था। तीर्थनगरी अयोध्या में भगवान का जन्म हुआ।
जिस दिन भगवान का जन्म हुआ। उस दिन रोहिणी नक्षत्र था। धर्म शास्त्रों में वर्णित जानकारी के अनुसार भगवान आदिनाथ सवार्थ सिद्धि नामक अनुत्तर विमान से देव पर्याय को छोड़कर गर्भ में आए थे। माता मरुदेवी को रात्रि में 16 सपने आए थे, जो तीर्थंकर के आगमन का संकेत थे। भगवान आदिनाथ के गर्भ में आने की खुशी में इंद्र और अन्य देवगण ने माता मरुदेवी की सेवा की। भगवान आदिनाथ के जीवन के पांच कल्याणक हैं, जिनमें गर्भ कल्याणक भी शामिल है।
गर्भ कल्याणक जैन धर्म के लिए एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह भगवान आदिनाथ के जन्म के पहले चरण का प्रतीक है और यह दर्शाता है कि कैसे एक महान व्यक्ति का जन्म होता है। यह दिन जैन समुदाय के लिए श्रद्धा और भक्ति का दिन है, जिसमें लोग मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं और भगवान आदिनाथ के जीवन की शिक्षाओं का पालन करते हैं। इस दिन मंदिर में विशेष पूजा और प्रार्थनाएं की जाती हैं।
कई मंदिरों और धार्मिक स्थानों पर विशेष समारोह आयोजित किए जाते हैं। यह उत्सव जैन धर्म की संस्कृति और परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह दिन ध्यान और आत्म-साधना के लिए भी एक महत्वपूर्ण दिन माना गया है। जैन पुराण साहित्य में लिखा गया है कि छह कलाएं असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प, कला का उपदेश ऋषभदेव जी ने दिया।













Add Comment