दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 112वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
प्रेम भाव एक चाहिए, भेस अनेक बनाय।
चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाए॥
कबीर दास जी इस दोहे में स्पष्ट करते हैं कि जीवन में चाहे कोई कितने भी प्रकार के भेष (वेशभूषा, पद, धर्म, जीवनशैली) क्यों न धारण कर ले, यदि उसके हृदय में प्रेम का भाव नहीं है, तो वह सब व्यर्थ है। प्रेम एक ऐसा तत्व है जो न तो शरीर का विषय है, न ही बाह्य आडंबरों या कर्मकांडों का। यह आत्मा की सहज, निर्मल और शुद्ध अवस्था है।
कबीर कहते हैं कि एकमात्र प्रेम भाव ही सभी साधनों से श्रेष्ठ है, क्योंकि प्रेम के बिना धर्म केवल एक आडंबर बनकर रह जाता है। चाहे कोई गृहस्थ जीवन जी रहा हो या वन में संन्यास लेकर तपस्या कर रहा हो—यदि उसके भीतर दूसरों के प्रति सच्चा प्रेम, दया, करुणा और आत्मीयता नहीं है, तो उसकी साधना अधूरी मानी जाती है।
यह दोहा सामाजिक दृष्टि से भी गहरा संदेश देता है कि भले ही हम विभिन्न जातियों, संप्रदायों या वर्गों में विभाजित हों, यदि हम एक-दूसरे से प्रेम नहीं कर सकते, तो हमारा समाज भीतर से खोखला है।
कबीर दास जी इस दोहे के माध्यम से यही कहना चाहते हैं कि “प्रेम” ही जीवन, धर्म, समाज और आत्मा की सच्ची भाषा है। हम किसी भी वेश में हों, किसी भी स्थान पर हों—यदि हृदय में प्रेम नहीं है, तो सब कुछ व्यर्थ है। और यदि प्रेम है, तो जीवन का हर पहलू सार्थक हो जाता है।













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