जैन समाज के साथ हिन्दु समाज में अक्षय तृतीया का धार्मिक उल्लास है। इस बार अक्षय तृतीया 30 अप्रैल को आ रही है। इस दिन भगवान ऋषभनाथ जी को लगभग एक वर्ष के बाद आहार मिला था। उन्होंने इक्षु रस से पारणा किया था। यह इंदौर वासियों के लिए भी सौभाग्य की बात है कि इसी दिन 30 अप्रैल को आचार्यश्री विशुद्धसागरजी महाराज को पट्टाचार्य की पदवी से विभूषित किया जाएगा। यह सुसंयोग सुमतिधाम की धरा पर बन रहा है। अक्षय तृतीया को लेकर वैसे तो असंख्य मान्यताएं हैं, लेकिन इनमें से प्रमुख मान्यताओं के बारे में श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में उपसंपादक प्रीतम लखवाल की कलम से जानिए…
इंदौर। जैन समाज के साथ हिन्दु समाज में अक्षय तृृतीया का धार्मिक उल्लास है। इस बार अक्षय तृतीया 30 अप्रैल को आ रही है। जब भगवान ऋषभदेव संसार, शरीर और भोगों से विरक्त हो तप और मौन साधना करने के बाद आहार के लिए नगर और ग्रामों में विहार करने लगे, कोई भी अज्ञानता के कारण विधि पूर्वक उन्हें आहार नहीं देता था। छह माह बाद जब पुनः आहार के लिए हस्तिनापुर पहुंचे तब वहां के राजा श्रेयांस ने उन्हें इक्षु रस प्रदान किया। इससे उन्होंने आहार प्राप्त किया। जिस दिन यह आहार प्राप्त किया। उस दिन वैशाख मास की अक्षय तृतीया थी। इधर, यह इंदौर वासियों के लिए भी सौभाग्य की बात है कि इसी दिन 30 अप्रैल को आचार्यश्री विशुद्धसागरजी महाराज को पट्टाचार्य की पदवी से विभूषित किया जाएगा। यह सुसंयोग सुमतिधाम की धरा पर बन रहा है। अक्षय यानि कभी जिसका क्षय न हो, इस तिथि का जैन धर्म से गहरा संबंध है। हिन्दु धर्म में यह अति पुण्यकारी तिथि के रूप में वर्णित है। यह भी मान्यता है कि इस तिथि पर होने वाले विवाह भी अक्षय होते हैं। हिन्दू धर्म में अक्षय तृतीया पर्व का बहुत अधिक महत्व है। अक्षय तृतीया का पर्व इस वर्ष अत्यंत विशिष्ट संयोगों के साथ मनाया जाएगा। 30 वर्षों बाद इस पावन दिन पर बुधवार का दिन रोहिणी नक्षत्र, शोभन योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग एक साथ बन रहे हैं। ज्योतिषाचार्यों के इस दुर्लभ संयोग में किया गया हर पुण्यकर्म अक्षय फल देने वाला होगा और जीवन में सुख, समृद्धि तथा उन्नति के द्वार खोलेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया को युगादि तिथि भी कहा जाता है। इसी दिन त्रेता युग का प्रारंभ हुआ था। इस दिन दान, जप, तप, हवन आदि कर्मों का फल अनंत गुना हो जाता है। जैन धर्म के अनुसार भगवान ऋषभदेव ने पारणा इसी दिन राजा श्रेयांश द्वारा इक्षुरस (गन्ने के रस) से किया था। इसलिए आहार दान, जलदान और औषधि दान का विशेष महत्व है। जैन धर्म में अक्षय तृतीया को इक्षु तृतीया भी कहा जाता है।
जैन धर्म में अक्षय तृतीया का महत्व
प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ ने 6 महीने आहार और 6 महीने बिना आहार व्रत ले रखा था। जब वे आहार के लिए विहार करते तो उन्हें विधि-विधान से आहार नहीं मिला। ऐेसे में उन्हें आहार मिले एक वर्ष बीत गया। एक वर्ष बाद जब उन्हें विधि अनुसार आहार मिला उस दिन अक्षय तृतीया थी। हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस ने आहार दान किया था। इसलिए इस दिन दान का महत्व भी बहुत अधिक है। अक्षय तृतीया पर जैन समाजजन दान करते हैं, क्योंकि यह माना जाता है कि भगवान ऋषभनाथ ने सबसे पहले समाज में दान का महत्व समझाया था। जैन धर्म में अक्षय तृतीया को इक्षु तृतीया भी कहा जाता है। अक्षय तृतीया पर दान में जैन धर्म के लोग आहार दान, ज्ञान दान, औषधि दान या मंदिरों में दान करते हैं।
अक्षय तृतीया पर यह भी जानें
अक्षय तृतीया के दिन नए युग की शुरूआत हुई थी। इस दिन से त्रेतायुग का आरंभ हुआ था। मान्यता यह भी है कि इसी दिन भगवान विष्णु के छटवें अवतार के रूप में भगवान परशुराम का प्रकटीकरण हुआ था। अक्षय तृतीया के दिन से ही महर्षि वेद व्यास ने भगवान श्रीगणेश की सहायता से महाभारत का लेखन आरंभ करवाया था। एक अन्य मान्यता है कि इसी दिन लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम ने अग्नि परीक्षा लेकर माता सीता को दुबारा अपनाया था। एक और किवदंती है कि पांडवों को इसी दिन अक्षय पात्र प्राप्त हुआ था, जिसमें कभी भोजन समाप्त नहीं होता था।













Add Comment