दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -97 सच्चे प्रेम से पुकारने पर जीवन के अंतिम क्षण में भी ईश्वर हमारे साथ होते हैं : जीवन में सच्चाई, भक्ति और आत्म-निरीक्षण से ही सफलता मिलती है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 97वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार।

बाल सनेही सांईयां, आवा अंत का यार॥


इस दोहे में कबीरदास जी ने ईश्वर की प्राप्ति के अंतिम क्षण, आत्मा की ईश्वर से प्रत्यक्ष भेंट, और भक्ति के निष्कलंक स्वरूप को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से व्यक्त किया है। यह दोहा उस क्षण का चित्रण करता है जब भक्ति और साधना का फल मिल रहा है — यानी ईश्वर का दीदार (दर्शन)। “घाट का परदा खोलना” एक प्रतीक है, जो माया, अज्ञानता, भ्रम और देहबुद्धि के आवरण को हटाने का संकेत देता है। जैसे ही आत्मा इन परदों को हटाती है, ईश्वर सामने प्रकट हो जाते हैं।

 

“बाल सनेही सांईयां” – ईश्वर को यहां मासूम बच्चे के समान स्नेही बताया गया है, जो निर्दोष, प्रेममय और सरल है। यह दर्शाता है कि ईश्वर कठोर नहीं, सहज और सुलभ हैं।

 

“आवा अंत का यार” – मृत्यु के अंतिम क्षण में वही ईश्वर आत्मा का सच्चा साथी बनकर आता है, जब यह संसारिक संबंध टूट जाते हैं। यह हमें यह विश्वास देता है कि जीवन के अंतिम क्षण में भी ईश्वर हमारे साथ होते हैं, अगर हमने उन्हें सच्चे प्रेम से पुकारा है।

यहां कबीर बताते हैं कि सच्चा संबंध केवल आत्मा और परमात्मा के बीच है। न समाज के पद, न मान-सम्मान, न रिश्ते — कोई साथ नहीं जाता। जो सच्चा है, वह अंत में प्रकट होता है – वही ईश्वर है।

 

यह दोहा समाज को सत्य, सरलता और प्रेममयी जीवन जीने की प्रेरणा देता है, क्योंकि अंततः वही मूल्यवान होता है जो भीतर से पवित्र है, न कि सामाजिक दिखावा। हमें सिखाता है कि जीवन में सच्चाई, भक्ति और आत्म-निरीक्षण से ही अंततः सफलता और शांति मिलती है। यहां “परदा खोलना” आत्मज्ञान, आत्मस्वीकृति और अपने भीतर झांकने का प्रतीक है।

हमें बताता है कि जब हम अपने अहंकार, मोह, छल और स्वार्थ के पर्दे को हटा देते हैं, तभी हमें अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य और ईश्वर के सच्चे रूप का अनुभव होता है।

 

यह दोहा आत्मा की उस स्थिति को प्रकट करता है जब वह ईश्वर से एकाकार होती है। यह आत्म-साक्षात्कार और परमात्मा के साक्षात्कार का क्षण है। कबीर कहते हैं कि मृत्यु के समय, जब सब छूट जाता है, तब ईश्वर अपने प्रेमिल, कोमल और शिशु-से हृदय से आत्मा को अपनाते हैं।

 

“अंत का यार” यानी मृत्यु के क्षण में जो साथ छोड़ता नहीं, वही सच्चा साथी और परम आश्रय है — ईश्वर। यह दोहा हमें भौतिक जीवन की क्षणभंगुरता और ईश्वर प्रेम की शाश्वतता का बोध कराता है।यह दोहा भक्ति, आत्मा की मुक्ति, और जीवन के अंतिम सत्य की सबसे कोमल और गहन व्याख्या है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page