मुनि श्री सुधासागर जी बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजमान हैं। यहां नित्य प्रवचन हो रहे हैं। समाज जन रोज धर्म लाभ ले रहे हैं। बहोरीबंद से पढ़िए यह खबर…
बहोरीबंद। निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा में प्रवचन देते हुए कहा कि ये दुनिया एक ऐसी अनिर्णीत वस्तु है जिसको निर्णय करके प्रकृति ने कुछ भी नहीं दिया। उसका मूल कारण था कि वस्तु में इतनी योग्यताएं हैं, वस्तु इतनी अनेकांतमयी है कि प्रकृति निर्धारण कर ही नहीं पाती कि हम किस वस्तु का क्या मूल्यांकन करे, वहीं वस्तु किसी के लिए अनमोल है वही वस्तु किसी के लिए निर्मूल है, किसी के लिए सुखदाई है तो किसी को दुखदाई। हम नहीं कह सकते कि प्रातः काल का सूर्य निकलने अच्छा होता है, उल्लू से पूछो उसको कितना बुरा लगता है। हमें भगवान अच्छे लगते हैं लेकिन कई लोगों को भगवान बुरे लगते है। किसी को महाराज को देखकर अहोभाग्य भाव जागता है तो किसी को दुर्भाग्य।
मेरा धर्म जो चाहेगा वो होगा
तुम्हारी किस्मत में जो लिखा है सो होगा, ये नियतवाद है, यह संतोषी का, अहंकार से ऊपर उठने का मंत्र है। हमें धर्म यह नहीं कहता कि तुम्हारी किस्मत में जो लिखा है सो होगा, यदि किस्मत में ही सब कुछ लिखा है तो फिर धर्म करने से क्या होना है, इसलिए अपने धर्म पर विश्वास करो, मेरा धर्म जो चाहेगा वो होगा। नियत कहता है कि अग्नि का काम जलाना है और हमारा काम जलना लेकिन नहीं, होता है चमत्कार जैसे ही सीता अग्नि में कूदी, अग्नि ने जलाना बंद कर दिया, अग्नि नीर का कुंड बन गया, इसको बोलते है चमत्कार, ये है धर्म।
सारी वस्तुओं को हमें जुटाना पड़ता है
अर्थ, धर्म व काम ये तीन पुरुषार्थ हम अपने जीवन में करें। अर्थ का अर्थ क्या है? पैसा, मकान नहीं, हमारे जीवन के उपयोग की जितनी भी वस्तुएं हैं। वे उपयोगी वस्तुये कभी किस्मत से, नियत से, सर्वज्ञ से नहीं मिलती, सारी वस्तुओं को हमें जुटाना पड़ता है। अब जो उपकारी है सब अर्थ पुरुषार्थ में जाएगा। काम पुरुषार्थ का अर्थ वासना से लेना देना नहीं है, जूते मिले है तुम्हे अर्थ पुरुषार्थ से, जूते पहनना काम पुरुषार्थ है, जो-जो चीज आपने उपभोग की, वो सब काम पुरुषार्थ है। गाड़ी लाना अर्थ पुरुषार्थ है और गाड़ी में बैठना काम पुरुषार्थ है।
24 घंटे तीनों पुरुषार्थ एक साथ हों
भगवान की पूजा का नाम ही धर्म पुरुषार्थ नहीं है। आपको व्यापार करते समय ये भाव आ गया कि नहीं, ये धंधा मैं नहीं करूंगा क्योंकि मैं जैनी हूं, इसमें हिंसा है। आप भोजन की थाली कर बैठे हैं, मैं यह नहीं खाऊंगा, ये अभक्ष्य है, भोजन करते हो गया धर्म पुरुषार्थ। आप चमड़े के नहीं, कपड़े के जूते पहन रहे है, अहिंसा परमोधर्म:, जूते पहनते हुए धर्म पुरुषार्थ। 24 घंटे तीनों पुरुषार्थ साथ एक साथ चलना चाहिए।
देश का पैसा देश में
चोर चोरी करके माल को मार्केट में ले जाता है। वह देश की अर्थ व्यवस्था को कायम रखते हैं, घरों में रखे हुए धन को बाजार में लाते हैं, इसलिए अर्थ शास्त्री कभी चोरों को बुरा नहीं मानते। देश का पैसा देश में, ये राज विरुद्ध नहीं कहलाता। राज विरुद्ध वो कहलाता है, जिससे देश में विदेशी वस्तु को कानूनन मना किया है, स्मग्लरपना जितना है, सब राष्ट्रद्रोह में आएगा। अन्य देशों के साथ संबंध बनाना यह राष्ट्रद्रोह में आएगा।
जाति कलंकित नहीं होना चाहिए
तुम जो कुछ भी करते हो करो, बस तुम्हारे कारण से जाति कलंकित नहीं होना चाहिए, यदि आपने यह ध्यान रख लिया कि मैं ऐसा कोई कार्य नहीं करूंगा जिससे मेरी जाति बदनाम हो, जाओ आप जाति वाले कहलाएंगे, आप क्या आचरण पाल रहे है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जितनी ज्यादा आप इच्छाएं संसार से पूरी कराने का भाव करोगे, आप असमर्थ होते जाओगे।
पौधा अच्छी खाद, पानी चाहता है
जो-जो वस्तु तुम्हें चाहिए है। जरूरत है, वे वस्तु तुम्हारी कैसे होगी एक आदत बदल दो, तुम्हें अपनी इच्छा पूरी कराना है तो पहले आपको नियम लेना है, इसकी क्या इच्छा है, मैं नियम लेता हूं, इसकी हर इच्छा पूरी करूँगा। एक गमले में पौधा है, वह तुम्हारे काम का है, तुम्हारे काम आएगा, बस तुम्हे एक नियम लेना है, इस पौधे की क्या इच्छा है, वह अच्छी मिट्टी है अच्छी खाद, पानी चाहता है, आप उसकी इच्छा पूरी कर दीजिएगा, तुम्हें कुछ भी नहीं कहना पड़ेगा, वो तुम्हारी इच्छा पूरी कर देगा।
वह कोई नकारात्मक एनर्जी नहीं देगा
वह तुम्हे उसी समय से तुम्हें एनर्जी देना प्रारंभ कर देगा। पेड़ को चाहो, पेड़ से मत चाहो अभी। आप घर से बाहर गए है, आपको चिंता होगी कि आज पेड़ को पानी कौन देगा, उस पेड़ की ऐसी एनर्जी आपके पास जाएगी कि आप जंगल में दबे हो गए वह पेड़ आपकी कुशलता की कामना कर रहा होगा कि मेरा मालिक सुरक्षित आ जाए। आप फल तोड़ोगे तो भी वह कोई नकारात्मक एनर्जी नहीं देगा क्योंकि, इसी ने तो मुझे पाला है।
मां-बाप की हर इच्छा पूरी करूंगा
भगवान से मांगो गुरु से मांगो कि मैं अपने मां-बाप की हर इच्छा पूरी करना चाहता हूँ, तुमने भगवान से आशीर्वाद लिया, णमोकार मंत्र पढा। पुरुषार्थ करना है कि मैं अपनी मां-बाप की हर इच्छा पूरी करूंगा, तुम्हें अपने लिए मांगने की जरूरत नहीं है, उनकी इच्छा की पूर्ति की बाद ऐसा अतिशय होगा कि एक बार वे तुम्हारी तरफ देख लेंगे, तुम्हारी सारी इच्छाएं पूरी हो जाएगी लेकिन, संकल्प लेना है तुम्हे। जिनवाणी माँ जो तुम्हे खिलाएगी, वह मैं खाऊँगा, जाओ तुम्हारी जिंदगी खतरे से बाहर रहेगी, दुर्गति से बचोगे।













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