राजस्थान के जैन संतों के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में पढ़ने के बाद एक बात तो स्पष्ट है कि राजस्थान के धरती पर जितने भी संतों ने जन्म लिया। उन्होंने राजस्थान और गुजरात राज्य में समान रूप से विहार कर जैन धर्म की मजबूती के लिए जनजागरण किया और अपने साहित्य, काव्य और कृतियों की रचना की। ऐसे ही एक और संत ब्रह्म धर्मरुचि हुए, जिन्होंने राजस्थानी और गुजराती दोनों भाषाओं में अपनी रचनाएं लिखीं और जन-जन तक अपने संदेश पहुंचाए। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 26वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का ब्रह्म धर्मरुचि के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..
इंदौर। राजस्थान के जैन संतों में ब्रह्म धर्मरुचि का भी उत्कृष्ट और अलहदा स्थान है। इन्होंने राजस्थानी और गुजराती दोनों भाषाओं पर समान रूप से कलम चलाकर धर्म जागरण किया। संतों के विवरणों में भट्टारक लक्ष्मीचंद की परंपरा में दो अभयचंद्र भट्टारक हुए। एक भट्टारक अभयचंद्र अभयनंदी के गुरु थे तथा दूसरे अभयचंद्र भट्टारक कुमुदचंद्र के शिष्य थे। दूसरे अभयचंद्र का पूर्व में परिचय दिया जा चुका है। किन्तु ब्रह्म धर्मरुचि प्रथम अभयचंद्र के शिष्य थे। जिनका समय 16वीं शताब्दि का दूसरा चरण था। इनकी अब तक 9 कृतियां उपलब्ध हैं। जिनमें सुकमाल स्वामिनो रास, सबसे बड़ी रचना है। इसमें विभिन्न छंदों में सुकुमाल स्वामी का चरित्र वर्णित है। यह एक प्रबंध काव्य है। यद्यपि काव्य सर्गों में विभक्त नहीं है लेकिन, विभिन्न भास छंदों में विभक्त होने के कारण सर्गों में विभक्त नहीं होना खटकता नहीं है। रास की भाषा एवं वर्णन शैली अच्छी है। भाषा की दृष्टि में रचना गुजराती प्रभावित राजस्थानी भाषा में निबद्ध है।
ते देखी भयभीत हवी, नागश्री कहे तात।
कवण पातिग एणे कीया परिपरि पामंइ छे घात।
तब ब्राह्मण कहे सुंदरी सुणो तह्मो एणी बात।
जिम आनंद बहु उपजे जग मांहे छे विख्यात।
इस रास की रचना घोघानगर के चंद्रप्रभु चैत्यालय में प्रारंभ की गई थी और उसी नगर के आदिनाथ चैत्यालय में पूरी की हुई थी। कवि की अन्य कृतियां पीहरसालड़ा गीत, वणियडा गीत, मीणारे गीत, अरहंत गीत, जिनवर वीनती, पद एवं गीत आदि हैं।













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