जब भी आप उदास हों, आप अपने मुख की भाव-भंगिमा को अच्छा बनाने की कोशिश करें। आप परेशानी में भी अपने हृदय में अच्छे विचार रखने का प्रयास करें। मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज का कॉलम Life Management निरंतरता लिए हुए है। पढ़िए इसके 17वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….
उदास न बैठें
आप किसी भी समय, किसी भी परिस्थिति में उदास होकर न बैठें। आप प्रयास करें कि कोई आप से यह न पूछे कि-‘भाई, क्या हो गया है ? आप इतने उदास क्यों हैं‘ ? आपका पेशा कोई भी हो, आप अधिकारी हों या अधिकृत, आप विद्यार्थी हों या अध्यापक, आप बिजनेसमेन हों या सर्विसमेन। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप क्या हैं? फर्क इससे पड़ता है कि आप क्या सोच रहे हैं ? भले ही आप किसी भी क्षेत्र में असफल हो रहे हों, आपके घर के लोग आपकी बात न मानते हों, आपके परिजन आपको परेशान करते हों, आपको किसी की बात का गहरा आघात लगा हो, आपको कहीं अपमान मिला हो तो भी आप खुश रहें क्योंकि आपके हृदय पर, आपके मस्तिष्क पर मालकियत आपकी है किसी और की नहीं। उदासी और चिन्ता धीमी-धीमी आग हैं जो चिता पर जाकर ही बुझती हैं।
उदासी पर काबू पाएँ
आप जिस क्षेत्र में असफल हुए हैं उस क्षेत्र में आगे भी असफल ही रहेंगे, ऐसा न सोचें। कभी-कभी एक असफलता से जिन्दगी के सभी दरवाजे बंद हुए से लगते हैं किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता है। वास्तविकता यह है कि ‘जब एक दरवाजा बंद हो जाता है तब दूसरा खुल जाता है।‘ आप अपने आत्मविश्वास को बनाए रखिए। जो विद्यार्थी या धनार्थी निरन्तर प्रार्थना मुद्रा, ध्यान मुद्रा आदि का अभ्यास करता है वह अपनी चिन्ता और उदासी पर काबू पा लेता है।
जो उपलब्ध है उसकी खुशी महसूस करो
तुम आज चिन्तित हो तो इसका अर्थ है कि तुम ऐसे भविष्य की तैयारी कर रहे हो जो तुम्हें आगे चिन्ता में ही ढकेलेगा। यह एक ‘आध्यात्मिक कर्म सिद्धान्त‘ है कि दुःख के होने पर संस्कार रूप से दुःख ही आत्मा में बंध जाता है जो पुनः दुःख देकर ही अपना फल देता है। यही सिद्धान्त सुख के विषय में भी लागू होता है। इसी सिद्धान्त को आज का विज्ञान ‘आकर्षण का सिद्धान्त‘ कहता है। भीतर से उदास होकर आप कभी-भी ऐसी कोई भी बाहरी उपलब्धि प्राप्त नहीं कर सकते हैं जो आपको खुशी दे सके। इसलिए सबसे पहले उदासी छोड़ो, जो है उसकी खुशी महसूस करो फिर आगे बढ़ने की कोशिश करो।
पुरुषार्थ की असफलता प्रेरित करती है
हमें ज्ञात नहीं रहता है कि हमारा भाग्य क्या चाहता है ? हमारे पुरुषार्थ की असफलता किसी नए पुरुषार्थ की तैयारी और किसी नई दिशा पर ले जाने के लिए भी प्रेरित करती है। मेरे निजी जीवन का अनुभव है कि-‘मैं आईआईटी (IIT) की कोचिंग करने गया, परीक्षा दी, सिलेक्शन (Selection) नहीं हुआ। मेरे परिवार को, मित्रजनों को और स्वयं मुझको भी इस बात की बेहद उम्मीद थी कि मैं (IIT) में पास हो जाऊँगा। एक वर्ष ड्राप करने के बाद बीएससी (B.Sc.) शुरु की। अन्ततः मेरे विचार बदल गए और आज मैं धर्म पथ पर चल रहा हूँ। वह असफलता ही मेरे लिए वरदान बन गई वरना इस साधुता का आनन्द इस जन्म में कभी नहीं मिलता।
समस्या का ऐसा कोई भी ताला दुनिया में नहीं है जिसकी चाबी न बनी हो।













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