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हिंदू मैरिज एक्ट के तहत जैन दंपत्ति के तलाक का मामला सुनने से इंकारः केंद्र सरकार ने अल्पसंख्यक दर्जा दे अलग मान्यता दी


फैमिली कोर्ट न्यायाधीश ने जैन समाज के दो पक्षकारों की तलाक की अर्जी खारिज कर दी उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने 27 जनवरी 2014 को राजपत्र जारी कर जैन समाज को अल्पसंख्यक समुदाय घोषित किया है। हिंदू धर्म की मूलभूत वैदिक मान्यताओं को अस्वीकार करने वाले और स्वयं को बहुसंख्यक समुदाय से अलग करके अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में घोषित कर चुके जैन समाज के अनुयायियों को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं है। निराकरण हेतू परिवाद प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र 


जैन धर्म का कोई भी अनुयायी अपने धर्म के हजारों वर्ष पुरानी धार्मिक और सामाजिक परंपराओं को व्यक्त करते हुए कुटुंब न्यायालय अधिनियम की धारा-7 के तहत अपने किसी वैवाहिक विवाद के निराकरण के लिए परिवाद प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र है। फैमिली कोर्ट के प्रथम अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश धीरेंद्रसिंह ने यह फैसला जारी किया है। इंदौर के एक दंपत्ति ने तलाक के लिए फैमिली कोर्ट में अर्जी लगाई थी।

नेहरू की किताब का भी उल्लेख किया 

बहस के दौरान कोर्ट में वकीलों ने अपना पक्ष रखा कि वैवाहिक विवादों के निपटारे के लिए जैन समाज का अलग से कोई कानून नहीं है। हिंदू मैरिज एक्ट के तहत ही इनका निराकरण हो रहा है। हिंदू मैरिज एक्ट में मुस्लिमों को छोड़ हिंदू, सिख आदि को शामिल किया गया है। कोर्ट ने फैसले में पं. जवाहरलाल नेहरू की किताब भारत एक खोज का भी उल्लेख किया और कहा कि जैन निश्चित रूप से हिंदू धर्म या वैदिक धर्म नहीं है और कोई भी जैन आस्था से हिंदू नहीं है।

अपने फैसले में कोर्ट ने लिखा कि 1947 में ही जैन समाज द्वारा संविधान सभा के समक्ष समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग की गई थी। इस वजह से ही 2014 में केंद्र सरकार ने उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देकर अलग मान्यता दी। उन्हें अपनी धार्मिक परंपराओं के पालन का संवैधानिक हक है। विपरीत विचारधारा वाले धर्म की विधियों को पालन करने के लिए प्रेरित करना धार्मिक स्वतंत्रता का हनन बताया गया है।

हिंदू संहिता ने जैन धर्म को अलग मान्यता दी 

आर्य समाज एजुकेशन ट्रस्ट से जुड़े 1976 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने लिखा कि न सिर्फ संविधान बल्कि हिंदू संहिता ने भी जैन धर्म को अलग मान्यता दी है। जैन धर्म वेदों और बुनियादी वैदिक मान्यताओं का विरोध करता है। जैन धर्म के किसी भी अनुयायी को उनके धर्म से विपरीत मान्यता वाले धर्म से जुड़ी व्यक्तिगत विधि का लाभ देना उचित नहीं है।

सप्तपदी की परम्परा भी अलग 

यहॉ वकीलों ने तर्क दिया कि जैन अनुयायी के विवाह में सप्तपदी की हिंदू परंपरा का पालन किया जाता है। इस पर कोर्ट ने 10वीं सदी में आचार्यश्री वर्धमान सूरीश्वरजी के लिखित ग्रंथ आचार्य दिनकर ग्रंथ का उल्लेख किया और कहा कि इस पुस्तक में जैन विवाह के लिए जिस विधि का उल्लेख है, वह हिंदू विवाह विधि से अलग है। इस आधार पर भी एक्ट के प्रावधान लागू नहीं होते हैं।

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