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करुणा के सागर है आचार्यश्री विद्या सागरजी महाराजः एक वर्ष पूर्ण होने पर आज भी हम सभी की आँखें नम है 


आचार्यश्री विद्या सागरजी महाराज भारत की 21वीं सदी केएक ऐसे दिगंबर जैन संत थे, जिन्होंने एक वर्ष पहले समता के पंथ पर समाधिस्थ हो गये। उन्होंने मृत्यु को महामहोत्सव के रुप में मनाया। खुद के बल पर खड़े होकर हाथों को उठा कर आशीर्वाद देते थे। आचार्यश्री ने जैन समाज के तीर्थंकरों की परम्परा का निर्वहन करते हुए गुरुओं की कठिन तपस्या से पंच महाव्रतो सत्य, अहिंसा अपरिग्रह, अचौर्य ब्रह्मचर्य की साधना में लीन होकर तीन दिन उपवास रखते हुए महामंत्र णमोकार का जाप करते-करते अपनी देह त्याग दी थी। पढ़िए इंदौर से हरिहर सिंह चौहान की यह पूरी खबर…


इंदौर। आकाश में जो चमचमाते हुए तारे हैं, उसमें ध्रुवतारा एक ही है। उसी प्रकार जो संयम परिग्रह त्याग की जड़ों को मजबूती से थमे हुए थे। जिन्होंने लाखों करोड़ों महावीर के अनुयायियों को धर्म की देशना की और ले जाने वाले सच्चे पवित्र संयमी सारथी देह त्यागी तपस्वी और दिगम्बर की चर्या धारणकर जन-जन के संत आचार्यश्री विद्या सागरजी महाराज महाप्रयाण के एक वर्ष पूर्ण होने पर आज भी हम सभी की आँखें नम है।

समता के पंथ पर समाधिस्थ हो गये

भारत की 21वीं सदी के महान व पूजनीय साधक आज ही के दिन धरती से स्वर्ग के मोक्ष धामी पंथ की और शरीर को त्याग कर चले गए थे। आप एक ऐसे दिगंबर जैन संत थे, जिन्होंने एक वर्ष पहले समता के पंथ पर समाधिस्थ हो गये। उन्होंने मृत्यु को महामहोत्सव के रुप में मनाया। तभी तो गुरुदेव त्रिकालदर्शी थे जिन्होंने अपनी अंतरात्मा से जान लिया था, तभी तो अस्वस्थ होते हुए भी वह भक्तों को दर्शन देते रहे। खुद के बल पर खड़े होकर हाथों को उठा कर आशीर्वाद देते थे। आचार्यश्री ने जैन समाज के तीर्थंकरों की परम्परा का निर्वहन करते हुए गुरुओं की कठिन तपस्या से पंच महाव्रतो सत्य अहिंसा अपरिग्रह अचौर्य ब्रह्मचर्य की साधना में लीन होकर सजगता के साथ समाधि संलेखना के तीन दिन उपवास रखते हुए महामंत्र णमोकार का जाप करते-करते अपनी देह त्याग दी थी। यह तो पुण्य है भारत भूमि का जो ऐसे महान साधक की कर्मभूमि रही।

आध्यात्मिक यात्रा वर्धमान से वर्तमान की 

आचार्यश्री विद्या सागरजी का सफर विद्याधर से शुरू हुआ। उन्होंने दक्षिण के कर्नाटक राज्य के बेलगाम जिले के सदलगा गांव में 10 अक्टूबर 1946 को शरद पूर्णिमा के दिन जन्म लिया। विद्याधर से विधासागर की आध्यात्मिक यात्रा वर्धमान से वर्तमान की थी। आप ने अपने महाकाव्य मूक माटी की रचना स्वयं की थी। आचार्य भगवंत को 11 फरवरी 2024 को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड ने उन्हें ब्रह्मांड के देवता के रूप में सम्मानित किया गया। इस मृत्यु महोत्सव यानि संलेखना की कड़ी परीक्षा देते हुए 77 वर्ष की आयु में छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में स्थित डोंगरगढ़ के चंद्रगिरी तीर्थ पर सन् 2024 को देह त्याग कर चले गए।

मानव कल्याण व मानवीय मूल्यों की रक्षा 

विश्व कल्याण के मुख्य विचारों से जीव-जन्तू, पशु-पक्षियों के प्रति समर्पण भाव रखने वाले आचार्यश्री का हमेशा से एक लक्ष्य रहा जो राष्ट्र की सोच में वह गरीबों के दुख दर्द के लिए भी उनका मन हमेशा से चेतन रहता था। विचारों में वह कहते थे कि समाज के लोगों को वह निर्धन व्यक्तियो की मदद करते रहना चाहिए। मानव कल्याण व मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए जेल में बंद कैदियों के व्यक्तित्व में बदलाव आये और उनमें नकारात्मक सोच नहीं रहे। उसके लिए उन्हें एक अवसर अवश्य देना चाहिए। उन्हें जेल में रहकर रोजगार के लिए मेहनत करना चाहिए। जिससे गलत विचार उनके मन में नहीं आये।

भारत को भारत रहनें दें, इंडिया ना कहें 

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयीजी हो या वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी सभी से वह कहां करते थे कि गोवंश की रक्षा करें। भारत को भारत रहनें दें, इंडिया ना कहें। हिन्दी राष्ट्र व हिन्दी भाषा को आगे बढ़ाने के लिए आगे आए। इन सभी विषयों पर वह खुद भी हमेशा से प्रयासरत रहे। हथकरघा उद्योग में स्वलंबन बनने के लिए भी आगे रहे, गोशाला में गायों की देखभाल अच्छे से होए और आज की पीढ़ी धर्म, समाज व राष्ट्र के साथ साथ हिन्दी के करीब रहे। तभी भारत विश्व गुरु बनेगा। ऐसे विचारों को लेकर समाज की बुराईयों को दूर करने हेतु आचार्यश्री विद्या सागरजी महाराज हमेशा ही जनमानस के लिए पूजनीय रहें।

जहां-जहां उनके चरण पड़े वह स्थान तीर्थ बन गए

पूरे भारत में जहां-जहां उनके चरण पड़े वहां स्थान तीर्थ बन गए, आप सभी को जानकर आश्चर्य होगा की भारत के दिगंबर जैन संतों के संघ का सबसे बड़ा संघ आचार्य विद्या सागरजीका ही है। जिसमें अब तक 500 से ज्यादा मुनि, आर्यिकाएं, ऐलक, क्षुल्लक दीक्षा दी जा चुकी है।

कन्नड भाषी होकर आठ भाषाओं के ज्ञानी थे

महान योगी साधक चिंतक विचारक लेखक आचार्यश्री विद्या सागरजी को 8 भाषाओं ज्ञान था। कन्नड भाषी होते हुए हिन्दी, संस्कृत, प्राकृत, बांग्ला, मराठी, अंग्रेजी आदि अन्य भारतीय भाषाओं में आपको महारत हासिल थी। पर आप हिन्दी के प्रति गौरवांवित रहे और बुंदेलखंड व मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में ज्यादा समय व्यतीत किया। उन्हें गांव बहुत अच्छे लगते थे, शहरों की इस भाग-दौड़ भरे रास्तों से सुखी समृद्ध गांव जहां स्नेह प्रेम अपनापन मिलता है वहीं उनको प्रिय रहा।

गुरु की महिमा अपरम्पार है 

उन्होंने हमेशा समाजिक, राजनीतिक, धार्मिक गतिविधियों में सकारात्मक बदलाव लाने हेतु प्रयास किए। ऐसे जनमानस के आराध्य भूमि के प्रति समर्पित संत आचार्यश्री विद्या सागरजी महाराज के प्रथम समाधि स्मृति दिवस पर हम उन्हें शत्- शत् नमन करते हैं। गुरु की महिमा अपरम्पार होती है वह वटवृक्ष है उस पेड़ का, हम टहनिया पत्ते फल-फूल जरूर है। उनकी दिव्य दृष्टि, त्याग, तपस्या से जड़ रुपी वृक्ष मे उन्होंने ही हम सभी को थामे रखा है।

गुरुवर हमे भवसागर से पार लगा देते है 

इस जीवनरुपी घोर अंधकार मे डर भय हो, मन विचलित हो, ऐसे समय जब कोई सहारा नहीं देता तो ऐसे गुरु का साथ वह सच्चे मन से स्मरण मात्र से ही हर दुःख तकलीफ दूर हो जाती है। आचार्यश्री का दिव्य स्वरूप संकट मोचन के रूप मे हर भक्तों के साथ हमेशा रहेगा। जो सच्चे मन से उनके प्रति निर्मल भाव रखते है। ऐसे संत शिरोमणि गुरुवर विद्या सागरजी हमे भवसागर से पार लगा देते है। वह हम भक्तों के लिए करुणा के सागर रहे। उनकी मंद-मंद मुस्कान हमें सदियों तक हम गुरुभक्तों के बीच रहे। ऐसे सम्यक दृष्टि के युग प्रवर्तका आचार्यश्री विद्या सागरजी के चरणों में बारम्बार नमोस्तु।

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